दिल्ली का 150 साल पुराना ऐतिहासिक यमुना ब्रिज पर बना लोहे का पुल अब बूढ़ा हो गया है। 80 साल की अपनी तयशुदा उम्र इसने 1947 में ही पूरी हो गई है। बावजूद इसके रेलवे पुल अभी भी मुस्तैद खड़ा है। हर दिन इस पुल से 150 से ज्यादा ट्रेन गुजरती हैं। जबकि इसके विकल्प के तौर पर इसके बराबर नया पुल तैयार करने की योजना ढाई दशक पहले से तैयार है।
करीब 137 करोड़ रुपये का यह प्रोजेक्ट अभी हकीकत नहीं बन सका है। रेलवे ने एक बार फिर से इसकी नई तिथि जारी की है। वायदा जून 2025 तक तैयार करने का है। दरअसल, 1997-98 में रेलवे ने पुराने लोहे के पुल के बगल में नया पुल तैयार करने योजना बनाई थी। 2003 में पुल निर्माण का काम शुरू किया गया था।
बीस साल बाद भी यमुना पर एक किमी का रेल ब्रिज नहीं बन सका है। रेलवे के कई प्रोजेक्ट में से एक लोहे के पुल के बगल में नए पुल निर्माण भी सुस्त रफ्तार से चल रहा है। इसमें शुरुआत से ही रुकावटें आनी शुरू हो गई थीं। जो रोडमैप रेलवे ने तैयार किया था, उसमें सलीमगढ़ किले के समीप से रेल लाइन को गुजरना था।
किले पर निर्माण कार्य का असर पड़ने से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग ने आपत्ति जता दी। बाद में 2011 में रिपोर्ट आई कि इसका अलाइन्मेंट किले को बाईपास करके बनाया जाएगा। 2012 में एएसआई ने भी मंजूरी दे दी। बावजूद इसके 12 साल बीत जाने के बाद नया पुल तैयार नहीं हो पाया है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, अब निर्माण कार्य अंतिम चरण में है और इसी साल के अंतिम महीने से इस पर ट्रेनें चलने लगेंगी।
सन 1866 में बनकर तैयार हुआ था पुल
1866 में पहली बार दिल्ली और कोलकाता को रेल नेटवर्क से जोड़ने के लिए खोला गया था। इसे इंजीनियरिंग की असाधारण उपलब्धि माना गया है। लोहे के पुल नाम से मशहूर यह पुल यमुना नदी में पानी के खतरे के स्तर को मापने का संदर्भ बिंदु भी माना जाता है। यह पुल भारत की अमूल्य धरोहर है। इसने भांप से चलने वाली ट्रेन के युग, डीजल युग और अब बिजली से चलने वाली ट्रेन के युग को देख रहा है। ब्रिज नंबर 249 के नाम से पहचाना जाने वाला पुराना यमुना ब्रिज, दिल्ली-गाजियाबाद
खंड पर स्थित है।
एक किलोमीटर होगी लंबाई
पुराने लोहे के ब्रिज की लंबाई करीब 930 मीटर है और ठीक बगल में तैयार हो रहा नये की लंबाई करीब एक किलोमीटर। सीलमपुर मेट्रो स्टेशन से करीब से रेलवे नई ट्रैक इस पुल पर बिछाने का काम शुरू कर रहा है। अगले साल जून तक प्रोजेक्ट तैयार कर लिया जाएगा।
बाढ़ में बंद हो जाता है
खतरे का निशान मापने का पैमाना लोहे का पुल ही है। इस पर बने निशान से जल स्तर की माप होती है। खतरे का निशान पार करने पर पुल को बंद कर दिया जाता है। इस रूट से गुजरने वाली ट्रेनें दूसरे रास्तों पर डायवर्ट हो जाती हैं। पहली बार 1956 में इसे बंद किया गया था, जब यमुना में जलस्तर 677 फीट दर्ज किया गया था। इसके बाद पुल को 1978 में बंद किया गया था उस वर्ष जलस्तर 681 फीट तक पहुंच गया था। उसके बाद वर्ष 1988, 1995, 1997, 1998, 2000, 2001, 2002, 2008, 2010, 2013, 2023 में जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुंचने पर कुछ दिनों के लिए बंद किया गया था।