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आईआईटी दिल्ली में हुई संगोष्ठी में बोले विशेषज्ञ, 'गलत नीतियों का परिणाम है आर्थिक असमानता'

Tue, 16 Apr 2019 08:16 PM IST
vivek shukla परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सरकारी नीतियों की खामियों का ही परिणाम है कि आज देश आर्थिक असमानता के दौर से गुजर रहा है। फिर चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो। विकास की राह पर दौड़ रहा देश आर्थिक पिछड़ेपन से हार रहा है। 

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यह कहना है कार्ल स्ट्रोज एंडोस्कोपी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के रोहित गुलाटी का। पिछले दिनों आईआईटी, दिल्ली,  के सेमिनार हॉल में प्रबंधन अध्ययन विभाग (डीएमएस) द्वारा आयोजित एक परिचर्चा के दौरान गुलाटी ने  ऑक्सफैम रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि केवल 9 सबसे अमीर भारतीय पूरे देश के कुल लगभग 50 फीसदी परिवारों के बराबर धन रखते हैं। अगर इन चुनिंदा लोगों पर ईमानदारी से एक फीसदी भी टैक्स वसूला जाए तो देश के स्वास्थ्य पर खर्च होने वाला 50 फीसदी बजट एकत्रित किया जा सकता है।
 
परिचर्चा के दौरान  पेटीएम के वाइस प्रेसीडेंट सौरभ जैन ने कहा कि सवा सौ करोड़ आबादी वाले इस देश में समस्याएं भी लाखों-करोड़ों हैं। अगर इनमें से प्रत्येक समस्या के निदान के लिए एक स्टार्ट अप उद्योग खोल दिया जाए तो रोजगार की समस्या स्वयं सुलझ जाएगी।  अगर किसी को कोई परेशानी है तो उसे दूर करने के लिए किसी सरकारी नुमाइंदे का इंतजार करने से बेहतर है कि परेशानी को खुद हल किया जाए।  जिस तरह  पेटीएम ने लोगों को डिजिटल कैश का विकल्प दिया, ठीक उसी तरह नए स्टॉर्ट अप करोड़ों लोगों को नए नए विकल्प उपलब्ध कराएंगे। 
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अमर उजाला के वरिष्ठ संपादक संजय अभिज्ञान ने कहा कि अवसर की समानता और सत्ता-भागीदारी की समानता भी आय की समानता जितने महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। लेकिन अमीरी-गरीबी की बहस में उनका जिक्र अमूमन छूट जाता है। उन्होंने कहा कि मौजूदा राजनीति सामाजिक सुरक्षा या सेफ्टी नेट देने की दिशा में बढ़ रही है जो सकारात्मक संकेत है। किसान सम्मान निधि या 72 हजार सालाना देने जैसे चुनावी वायदों को लोकलुभावन विचलन कह कर खारिज करना उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि इंडस्ट्री के बदलावों के हिसाब से हुनर विकास ही रोजगार निर्माण सुनिश्चित करेगा। 
 

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थॉमसन रॉयटर्स की वाइस प्रेसीडेंट श्रुति जायसवाल का कहना था कि बाजार का नियम है कि पहले कोई क्रांतिकारी तकनीक वजूद में आती है, उसके बाद ही उसके हिसाब से प्रतिभाशाली कर्मचारियों की खोज आरंभ होती है। तकनीकी अनुसंधान की गति इतनी तेज है कि हर महीने कोई न कोई क्रांतिकारी तकनीक आ जाती है। इसलिए अपस्किलिंग या राइट स्किल ट्रेनिंग की बजाय समाज को एडवांस स्किलिंग यानी अग्रिम तौर पर सुयोग्य मैनपॉवर तैयार रखनी होगी। तभी हम रोबोटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स या आर्टिफिशल इंटेलिजेंस जैसी बेरोजगारी पैदा करने वाली तकनीकों का मुकाबला कर पाएंगे। 
 
वीकेंड इन्वेस्टिंग कंपनी के संस्थापक आलोक जैन का कहना था कि गरीबी कायम रहने की एक वजह यह है कि देश में आज भी लोगों को बचत से सही जुड़े तौर तरीकों की जानकारी नहीं है।  ज्यादातर लोग सोना और रियल एस्टेट में बचत लगाकर फंसा देते हैं जबकि जरुरत इसकी है कि बचत को रोजगार पैदा करने वाले कारखाने-उद्योगों में निवेश किया जाए। 
 
 परिचर्चा के अंत में प्रोफेसर सीमा शर्मा ने आर्थिक असमानता, जलसंकट, वायुप्रदूषण जैसे मुद्दों को संयुक्त रुप देते हुए देश के करोड़ों लोगों से अपील की कि ब्रांड या शॉपिंग मॉल्स की बजाय छोटे दुकानदार या वेंडर से सामान लेने को पहली पसंद बनाएं। ताकि असमानता की टीस को दूर करने में कुछ फीसदी मदद हो सके। अंत में आईआईटी दिल्ली के छात्रों ने परिचर्चा में मौजूद विशेषज्ञों से सवाल भी किए।   जेके पेपर्स के सीएफओ वी कुमारस्वामी ने परिचर्चा का संचालन किया। 
 
कमजोर नेत्ररोगियों को सस्ता विकल्प
देश के वर्तमान आर्थिक हालात पर करीब एक घंटे चली परिचर्चा के दौरान क्लियरदेखो डॉट कॉम के सौरभ दयाल ने बताया कि आर्थिक असमानताओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों तक बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना बड़ी चुनौती है। गरीबी के कारण लाखों रोगी अपने लिए चश्मा तक नहीं बनवा पाते। इसीलिए उन्होंने एक स्टॉर्ट अप शुरू किया है, जो 500 रुपये में लैंस सहित चश्मा उपलब्ध कराता है। उन्होंने ये भी कहा कि जल्द ही उनकी पहुंच ग्रामीण भारत तक होगी। 
 
टैक्स प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान है
मुंबई सेंटर फॉर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन की सेक्रेटरी जनरल व रजिस्ट्रार नीति सचदेवा ने परिचर्चा के दौरान कहा कि आर्थिक असमानता को दूर करने  के लिए टैक्स नीति प्रबंधन पर जोर दिया जाना चाहिए लेकिन सच है कि आज लोग टैक्स बचत प्रबंधन पर ज्यादा जोर देते हैं जिसमें उन्हें वकीलों और चार्टर्ड एकाउंटेंटों की मदद मिलती है।  टैक्स बचत के लिए ही कई कंपनियां सामाजिक भलाई वाले सीएसआर कार्यक्रम चला रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि  शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तीनों देश के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। अगर इन पर जोर दिया जाए तो काफी हद तक आर्थिक असमानता से लड़ा जा सकता है।
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