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डूसू चुनाव में जाट बनाम मीणा: एबीवीपी-एनएसयूआई ने समीकरण बदला, बौद्ध अध्ययन विभाग फिर सुर्खियों में; जानें

Sat, 12 Sep 2026 05:32 PM IST
अनुज कुमार रश्मि शर्मा, अमर उजाला, दिल्ली

सार

डूसू चुनाव में इस बार जाट बनाम मीणा समुदाय के बीच सियासी जंग देखने को मिलेगी। जहां पिछले वर्षों के जाट-जाट या जाट-गुर्जर समीकरणों से अलग है। वहीं दूसरी तरफ दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में इस बार भी बौद्ध अध्ययन विभाग सुर्खियों में है। सूची में 20 उम्मीदवारों में से आठ उम्मीदवार अकेले बौद्ध अध्ययन विभाग से हैं।
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डूसू चुनाव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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डूसू चुनाव में इस बार जाट बनाम मीणा की सियासी जंग देखने को मिलेगी। मुख्य प्रतिद्वंदी एनएसयूआई ने जहां अध्यक्ष पद पर राजस्थान के मीणा पर अपना दांव खेला हैं, वहीं एबीवीपी ने जाट उम्मीदवार पर भरोसा जताया है। जबकि हर साल दोनों संगठन आमने-सामने जाट-जाट, या जाट-गुर्जर को उतारते हैं, लेकिन इस बार समीकरण थोड़े बदले गए हैं।

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अध्यक्ष पद की दौड़ में मीणा समुदाय के बीच राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश साफ नजर आ रही है। एनएसयूआई ने अध्यक्ष पद के लिए राजस्थान से आने वाले उम्मीदवार को मैदान में उतारकर एक मजबूत सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश की है, वहीं सहसचिव पद पर भी राजस्थान के एक अन्य चेहरे को टिकट दिया गया है। 

कहा जा रहा है कि एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ राजस्थान से आते हैं, ऐसे में राजस्थान से दो उम्मीदवार बनाए गए हैं। वहीं एबीवीपी ने अध्यक्ष पद पर जाट, उपाध्यक्ष पद पर मौर्य, सचिव पद पर गुर्जर व सहसचिव पद पर राजपूत समुदाय के प्रत्यार को उतार कर दांव खेला है।

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एनएसयूआई के टिकट बंटवारे में दिखी संगठन की अंदरूनी खींचतान
एनएसयूआई के टिकट बंटवारे ने संगठन के भीतर चल रही खींचतान सामने ला दी है। टिकट बंटवारे के बाद एनएसयूआई से टिकट मांग रहे चार प्रत्याशी आपस में भिड़ गए। एनएसयूआई से दीपांशु शौकीन और विशेष यादव भी टिकट मांग रहे थे लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला, जबकि उन्हें पूरी उम्मीद थी। 

इनके बजाय वीर चतरथ और गोपाल चौधरी को उम्मीदवार बनाया गया। इस कारण चारों में काफी मार-पिटाई भी हुई। बताया जा रहा है कि समर्थकों के बीच हुई इस झड़प में गोपाल चौधरी के सिर में चोटें आई हैं। टिकट बंटवारे से नाराज दीपांशु शौकीन ने तो निर्दलीय लड़ने का फैसला किया है। उनका नामांकन भी क्लीयर हो गया था। वहीं, विशेष यादव का नाम भी फाइनल सूची में है। ऐसे में संगठन से नाराज दोनों उम्मीदवार एनएसयूआई के वोट काट सकते हैं।

डूसू के दंगल में बौद्ध अध्ययन विभाग का दबदबा
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव में इस बार भी बौद्ध अध्ययन विभाग सुर्खियों में है। डूसू चुनाव के लिए उम्मीदवारों की अंतिम सूची पर नजर डालें तो कुल 20 उम्मीदवारों में से आठ उम्मीदवार अकेले बौद्ध अध्ययन विभाग से हैं। इतने उम्मीदवारों का एक ही विभाग से होना यह दर्शाता है कि डूसू की राजनीति में बौद्ध अध्ययन विभाग एक महत्वपूर्ण केंद्र है।

प्रमुख संगठनों के उम्मीदवारों की बात करें तो इस वर्ष एबीवीपी व एनएसयूआई दोनों के ही अध्यक्ष पद के उम्मीदवार बौद्ध अध्ययन विभाग से हैं। वहीं एनएसयूआई के उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार भी इसी विभाग से हैं, जबकि एनएसयूआई से टिकट ना पाने वाले एक अन्य उम्मीदवार भी इसी विभाग से हैं। एनएसयूआई की सचिव उम्मीदवार व सहसचिव पद के उम्मीदवार भी इसी विभाग से हैं।
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पिछले साल भी आठ उम्मीदवार इसी विभाग से
बौद्ध अध्ययन विभाग का डूसू चुनाव से यह जुड़ाव नया नहीं है। पिछले साल भी संगठनों ने इसी विभाग से अलग-अलग पद के लिए इसी विभाग से प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। एबीवीपी के तो अध्यक्ष पद के उम्मीदवार जीते भी थे। बीते वर्षों में भी संगठन इस विभाग से अपने प्रत्याशी उतारते आ रहे हैं। डीयू में पिछले कुछ वर्षों से यह चर्चा भी लगातार होती रही है कि डूसू चुनाव में टिकट पाने की उम्मीद रखने वाले कई छात्र बौद्ध अध्ययन विभाग में दाखिला लेते हैं। हालांकि इस संबंध में छात्र संगठनों की ओर से कोई आधिकारिक नीति सामने नहीं आई है। इसके बावजूद बीते कुछ वर्षों में इस विभाग से बड़ी संख्या में उम्मीदवारों के सामने आने से इसकी चुनावी भूमिका पर चर्चा तेज हो गई है।
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