एक कागज के दो मकसद
छात्र जिन पर्चों को अपने प्रत्याशी के समर्थन में दूसरे छात्रों तक पहुंचा रहे थे, वही पर्चे कुछ देर बाद चुनावी भीड़ से निकलकर सड़क पर पहुंचते ही इन बच्चों के लिए रद्दी में बदल गए। छात्रों के लिए कागज का मकसद वोट मांगना था, जबकि बच्चों के लिए उसकी कीमत उससे मिलने वाले चंद पैसों में थी। बच्चे सड़क किनारे, फुटपाथ और दुकानों के आसपास बिखरे पर्चे चुनकर एक जगह जमा करते रहे। आसपास छात्र आते-जाते रहे। कहीं प्रत्याशियों के समर्थन में नारे लग रहे थे तो कहीं चुनावी चर्चा चल रही थी। इस पूरे शोर के बीच बच्चों का ध्यान सिर्फ उन कागजों पर था, जिन्हें वे अपनी दिनभर की कमाई में बदलने की कोशिश कर रहे थे।
नॉर्थ से साउथ कैंपस तक दिखी तस्वीर
डीयू नॉर्थ के अलावा साउथ कैंपस के आसपास भी कई जगहों पर बच्चे चुनावी पर्चे बटोरते दिखाई दिए। बातचीत में उन्होंने बताया कि वे सुबह से ही कागज जमा कर रहे हैं और बाद में इन्हें रद्दी में बेच देंगे। पर्चे पर किस प्रत्याशी का नाम है, वह किस पद के लिए चुनाव लड़ रहा है या किस संगठन का समर्थन किसे हासिल है-इन बातों से उनका कोई सरोकार नहीं था। उनकी कोशिश बस इतनी थी कि ज्यादा से ज्यादा कागज इकट्ठा हो जाएं।
चुनावी संदेश से रोजी-रोटी तक
मतदान खत्म होने के बाद जिन पर्चों की राजनीतिक उपयोगिता समाप्त हो गई, उन्हीं कागजों में इन बच्चों के लिए आर्थिक जरूरत पूरी करने की उम्मीद बनी रही। एक ही पर्चे ने कुछ देर के अंतराल में दो बिल्कुल अलग अर्थ ग्रहण कर लिए-पहले वह छात्रों के लिए वोट मांगने का माध्यम था और बाद में बच्चों के लिए रद्दी में बिकने वाला कागज। डूसू चुनाव का दिन जहां छात्रों के लिए लोकतांत्रिक भागीदारी और सियासी भविष्य से जुड़ा था, वहीं इन बच्चों के लिए बिखरे पर्चों के बीच रोज की जरूरत का पैसा तलाशने का दिन बन गया।