साल 2013 के आखिर में भारत के जाने-माने एक्टिविस्ट-संपादक तरुण तेजपाल अपनी एक सहयोगी के यौन उत्पीड़न के आरोप में गोवा में गिरफ्तार हुए थे।
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बाद में ये सामने आया कि तहलका पत्रिका 40 करोड़ रुपए के घाटे में थी। तहलका में तरुण का भी मालिकाना हक था। इस पत्रिका में कई लोगों ने निवेश किया था। इनमें एक सांसद भी थे।
सवाल उठता है कि ये निवेश क्यों?
हालांकि उस समय कवरेज यौन हमले पर केंद्रित थी, लेकिन तहलका मामले से मीडिया के स्वामित्व, ट्रेनिंग और नाकाम होते बिजनेस मॉडल को लेकर कई सवाल उठे। इन मुद्दों पर ध्यान देना अब और जरूरी हो गया है क्योंकि कई लोग मानते हैं कि जेएनयू मसले को लेकर मीडिया कुछ हद तक उन्मादी हो गया है।
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देश विरोधी नारे लगाते छात्रों के एक कथित वीडियो के सामने आने के बाद पुलिस कैंपस में गई। एक छात्र को गिरफ्तार किया गया। एक विधायक और वकीलों ने दिल्ली में अदालत के बाहर पत्रकारों, छात्रों और शिक्षकों को पीटा।
विचारधाराओं के प्रति मीडिया का झुकाव!
लेकिन ये न्यूज चैनल थे जो इस मसले को असहमति के अधिकार से आगे ले गए। कई संपादकों ने अपनी दलीलों की आवाज ऊंची की है और दूसरों पर राष्ट्रवाद के नाम पर हमला बोला।
ये तीखापन और तंज खतरनाक है। इसलिए नहीं कि इससे उनका विचारधारा के प्रति झुकाव दिखता है, प्रिंट और टीवी में कई ब्रांड दक्षिणपंथ, वामपंथ की ओर झुकते दिखते ही हैं।
ये इसलिए खतरनाक लगता है क्योंकि इस तरह के हमलों ने मीडिया के अंदर और बाहर कई लोगों को हिलाकर रख दिया है। इस बार भी वजह तहलका वाली ही है- बस एक नया पहलू जुड़ गया है। ये पहलू है ऑनलाइन। आइए हर एक पहलू पर नजर डालते हैं।
पहला तो ये कि मीडिया का कारोबारी मॉडल टूटा-फूटा और बिगड़ा है। भारत में दुनिया में सबसे ज़्यादा अखबार (105,000 से ज़्यादा) और न्यूज चैनल (300 से ज़्यादा) हैं।
हालांकि 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'जागरण' जैसे समूह मुनाफा कमा रहे हैं। आगे बढ़ रहे हैं। वहीं हजारों ऐसे छोटे अखबार भी हैं जो पैसा नहीं कमाते लेकिन उनके मालिक उन्हें बेचते नहीं क्योंकि ये रसूख जमाने और वसूली के हथियार हैं।
रसूख बढ़ाने के लिए मीडिया का प्रयोग?
टीवी में दर्शकों और विज्ञापनों की संख्या थमती सी दिख रही है। इसका मतलब ये हुआ कि न्यूज चैनलों में होड़ है। साल 2012 में एक विश्लेषण से पता चला कि तब के 135 चैनलों में से एक तिहाई का इस्तेमाल उनके मालिक राजनीतिक प्रचार या अपना रसूख बढ़ाने के लिए कर रहे थे।
अब इससे दो तरह की कंपनियां आमने-सामने हैं। एक वो जो समाचार उद्योग को बढ़ाना चाहती हैं और दूसरी वो कंपनियां जिनकी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है और भारत में बीबीसी जैसी संस्था भी नहीं है जिसके कारण उन पर संतुलित कवरेज का दबाव बने। ब्रिटेन में बीबीसी की मौजूदगी से निजी चैनल आम तौर पर सीधे रास्ते पर रहे हैं।
वहीं भारत में दूरदर्शन आर्थिक और प्रशासनिक रूप से सरकार के हाथों में ही रहा है। इसलिए वाकई स्वतंत्र और अच्छी क्वालिटी वाले न्यूज ब्रॉडकास्टर के तौर पर खड़े होने की इसकी क्षमता सीमित रही है।
मीडिया के मालिकाना हक की बिगड़ती हालत में और बातें भी जोड़ लीजिए। कुछ ही संगठन हैं जो अच्छे कंटेंट और ट्रेनिंग में निवेश करते हैं। अच्छी रिपोर्टिंग में बहुत रिसर्च, विश्लेषण और सावधानी की जरूरत होती है, ऐसे संपादकों की जरूरत होती है जो रिपोर्टरों पर नियंत्रण रखे। ये बातें कई टीवी न्यूजरूम से गायब हैं।
ऐसे में आप जो टीवी पर देखते हैं वो तथ्य आधारित खबर की जगह चुभता हुआ, तीखा आलोचनात्मक नजरिया होता है। जरा सोचिए.. आखिरी बार कब ऐसा हुआ था कि भारतीय मीडिया ने अपने दम पर कोई बड़ा मसला उजागर किया था?
इसमें बहुत बड़ा योगदान उस सेल्फ सेंसरशिप का भी है, जो खराब कानून, कमजोर मीडिया मालिकों और आक्रामक एडवर्टाइजरों की देन है।
ज्यादातर मसले और टेप मीडिया संस्थानों को तश्तरी में सजा कर दिए जाते हैं। कई चैनल ये सवाल भी नहीं करते कि ऐसा क्यों किया गया और किसने किया। अगर समाचार किसी लोकतंत्र के लिए दिमागी खुराक है तो भारतीय ज्यादातर वक्त जंक फूड ही खाते हैं। टीवी पर अच्छे विकल्प सीमित हैं और ज्यादातर तो प्रिंट में ही हैं।
अब आखिरी बात.. जेएनयूए मसले को बढ़ाने का काम किया ऑनलाइन मीडिया ने। अल्गोरिदम यानी ऐसे फार्मूले जिनके जरिए सॉफ्टवेयर खास मकसद को पूरा करते हैं, उसी के जरिए चलने वाली इस दुनिया में अगर आप उदारवादी हैं तो अल्गोरिदम आपकी फीड में उदारवादी समाचारों और वीडियो को पुश करेगा।
ऑनलाइन ऐसी दुनिया बनाता है जहां ऑडियंस अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर बंटी हुई है। दक्षिणपंथी और उदारवादी अपनी-अपनी ऐसी दुनिया में हैं, जहां उनको दूसरे पक्ष के बारे में ज्यादा पता ही नहीं चलता। इससे ध्रुवीकरण होता है। अब संपादक इस दक्षिणपंथी या उदारवादी दुनिया पर निशाना लगा रहे हैं।
सबसे खास बात ये है कि सोशल मीडिया बेहद आसानी से लोगों को एक मंच देता है, जहां 140 अक्षरों की बात भी ऊंची लगती है। नतीजा ये कि जो बात किसी आम बहस में आसानी से निपट सकती थी वो अचानक राष्ट्रवाद, सम्मान या चेहरा छिपाने की बात बन जाती है।