तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।
उधर जमहूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो,
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है।
मशहूर कवि अदम गोंडवी की यह रचना दिल्ली की वर्तमान परिवहन व्यवस्था पर सटीक बैठती है। साल 2018 में दिल्ली सरकार ने महिला दिवस के अवसर पर डीटीसी बसों में महिला सुरक्षा के लिए पैनिक बटन लगवाने के लिए पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी है।
तब से अब तक मंत्री और अधिकारी दावे-दर-दावे करते जा रहे हैं, जबकि धरातल पर एक भी बस में पैनिक बटन नहीं लग पाया। यह प्रोजेक्ट सिर्फ ख्याली पुलाव बनकर रह गया है। ऐसे में सवाल यह है कि महिलाओं को डीटीसी बसों में मुफ्त और सुरक्षित सफर कैसे कराया जा सकता है?
डीटीसी के बेड़े में वर्तमान में करीब 3880 बसें हैं, जिनमें से करीब 3400 बसों को प्रतिदिन सड़क पर उतारा जाता है। अन्य का मेंटिनेंस आदि चलता रहता है। वर्ष 2007 से 2010 तक 2250 लो-फ्लोर नॉन एसी और 1700 लो-फ्लोर एसी बसों को भी बेडे में शामिल किया गया था। जिस समय इन बसों को खरीदा गया था तब तक इनमें पैनिक बटन लगे हुए थे, परंतु शुरुआती चरण में ही डीटीसी ने इन्हें स्थायी रूप से बंद कर दिया।
इसके पीछे डीटीसी की दलील थी कि यात्री बिना वजह बटन दबाते हैं, जिस कारण चालक को बस रोकनी पड़ती थी। डीटीसी का यह तर्क अपनी जगह सही था, लेकिन यदि पैनिक बटन को जारी रखा जाता तो अभी तक बसों में छेड़छाड़ जैसी घटनाओं पर काफी हद तक अंकुश भी लग जाता। महिला सुरक्षा के लिए यह बेहद अहमद व्यवस्था बन जाती।
एक साल का किया था वायदा
दिल्ली में महिलाओं के साथ बढ़ते अपराधों के मद्देनजर 7 मार्च 2018 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दिल्ली के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने डीटीसी की सभी बसों में पैनिक बटन सिस्टम लगवाने की घोषणा की थी। एक साल में इस योजना को परवान चढ़ाने का दावा किया गया, लेकिन अभी तक स्थिति ज्यों की त्यों है। बसों में पैनिक बटन लगना तो दूर, यह दावे फाइलों से बाहर तक नहीं निकल सके हैं।
सरकार से कोई निर्देश नहीं
डीटीसी प्रबंधन का कहना है कि फिलहाल एक भी बस में पैनिक बटन नहीं लग सका है। फिलहाल पैनिक बटन लगाने के संबंध में सरकार की ओर से कोई दिशा-निर्देश नहीं हैं।