दिल्ली सरकार राजधानी की हर संपत्ति को 14 अंकों का यूनिक प्रॉपर्टी आधार (पी-आधार) देने की तैयारी में है। इसे शहरी भूमि प्रबंधन में बड़े सुधार के रूप में देखा जा रहा है। इस व्यवस्था के तहत प्रत्येक भूखंड को यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (यूएलपिन) मिलेगा, जिससे संपत्ति की डिजिटल पहचान तय हो जाएगी। इससे खरीद-फरोख्त में फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी, पुश्तैनी विवाद कम होंगे और मालिकाना हक की पुष्टि के लिए लोगों को अलग-अलग सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
दिल्ली में अभी भूमि और संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड अलग-अलग विभागों में दर्ज हैं। रजिस्ट्री, म्यूटेशन, खसरा-खतौनी और नक्शे अलग-अलग कार्यालयों में होने से किसी संपत्ति का पूरा रिकॉर्ड जुटाना कठिन होता है। कई मामलों में दस्तावेजों और मौके की वास्तविक स्थिति में भी अंतर सामने आता है। वारिसों का नाम दर्ज कराने, सीमा विवाद सुलझाने या मालिकाना हक साबित करने के लिए लोगों को लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
नई व्यवस्था में संपत्ति का यूनिक नंबर उसके डिजिटल नक्शे, भौगोलिक स्थिति, निर्माण और संबंधित रिकॉर्ड से जुड़ा होगा। इससे एक ही संपत्ति की कई बार बिक्री, रिकॉर्ड में हेराफेरी और फर्जी दस्तावेजों के जरिए धोखाधड़ी की आशंका काफी कम हो जाएगी। शहरी नियोजकों का मानना है कि डिजिटल पहचान से संपत्ति लेन-देन अधिक पारदर्शी होगा और सरकारी राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी, क्योंकि सभी रिकॉर्ड एकीकृत डिजिटल प्रणाली में उपलब्ध रहेंगे।
आम आदमी को इस तरह मिलेगा फायदा
फर्ज कीजिए कि किसी परिवार के पास 30-40 साल पुराना मकान है। उसके पास रजिस्ट्री है, लेकिन मौके की सीमा को लेकर विवाद है या दस्तावेज में दर्ज क्षेत्रफल और वास्तविक निर्माण में अंतर है। ऐसे मामले में संपत्ति का रिकॉर्ड सिर्फ एक कागज नहीं, बल्कि कई रिकॉर्ड का मेल है। जबकि प्रॉपर्टी आधार से जमीन को स्थायी डिजिटल पहचान मिलेगी। दिल्ली में शुरू किए गए प्रॉपर्टी आधार में हर भूखंड को 14 अंकों का यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर यानी यूएलपिन मिलेगा। इसमें कागजी और जमीनी हकीकत अलग-अलग नहीं रहेगी। इसका सीधा मतलब है कि एक क्लिक पर यह नंबर संपत्ति मालिक ही नहीं, जमीन का डिजिटल नक्शा, उस पर हुए निर्माण और उसकी सीमा की पूरी जानकारी भी उपलब्ध कराएगा।
मालिकाना हक साबित करना आसान होगा
आज कई संपत्तियों के रिकॉर्ड अलग-अलग दस्तावेजों में दर्ज हैं। दिल्ली राजस्व विभाग की मौजूदा भूमि रिकॉर्ड व्यवस्था में खसरा, खतौनी, गिरदावरी, फील्ड बुक और म्यूटेशन जैसे रिकॉर्ड पहले से डिजिटल रूप में मौजूद हैं। नई व्यवस्था में इन सभी सूचनाओं को जमीन की डिजिटल लोकेशन और नक्शे से जोड़ा जाएगा। इससे भविष्य में किसी संपत्ति का सत्यापन केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि दस्तावेज जिस जमीन के हैं, मौके पर वही जमीन मौजूद है या नहीं। इससे सीमा और मालिकाना हक से जुड़े विवादों के समाधान में बड़ी आसानी होगी।