यमुना एक्सप्रेसवे पर 195 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से कार चलाने का मामला सामने आया है। हालांकि इतनी तेज गति से कार भगाने के बावजूद उसका चालान नहीं काटा जा सका। दरअसल ग्रेटर नोएडा आ रही मर्सडीज कार की रफ्तार इतनी तेज थी कि एक्सप्रेसवे पर खास तौर पर तैनात किए गए इंटरसेप्टर वाहनों के कैमरे भी नंबर प्लेट पढ़ नहीं पाए। बताया जा रहा है कि कार लखनऊ नंबर की थी।
अहम है कि करीब डेढ़ वर्ष पहले भी एक्सप्रेसवे पर 198 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार दर्ज की गई थी। उस दौरान भी कार का चालान नहीं कटा था। परिवहन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक एक्सप्रेसवे पर इंटरसेप्टर वाहन और उसमें बैठे अधिकारी व कर्मचारी कार पर तो फोकस कर पाए लेकिन नंबर प्लेट धुंधले दिखाई दे रहे थे। जिससे कार का चालान नहीं काटा जा सका।
अहम है कि यमुना एक्सप्रेसवे पर तेज रफ्तार वाहन चलाने के मामले कम नहीं हो रहे हैं। बीते चार माह के दौरान गति सीमा का पालन नहीं करने वाले 1212 वाहनों के चालान काटे गए हैं। इसमें मई में करीब 348, जून में 303, जुलाई में 289 और अगस्त में अब तक 272 चालान काटे गए हैं।
सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाने को लिखा पत्र
परिवहन विभाग के अधिकारियों ने जेपी कंपनी को पत्र लिखकर सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाने को कहा है। पत्र में कहा गया है कि जब कंपनी टोल वसूलती है तो यमुना एक्सप्रेसवे पर सुविधा देने का काम भी उसे ही करना होगा। कंपनी की ओर से कुछ कैमरे और लेजर स्पीड गन तो लगाए गए हैं लेकिन विभाग और यातायात पुलिस उनसे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। इसलिए जेपी कंपनी के लिए पत्र लिखकर इस पर पूरा सिस्टम तैयार करने के लिए कहा गया है। जिससे एक्सप्रेसवे पर यातायात नियमों का उल्लंघन पर रोक लगाई जा सके।
50 लाख खर्च कर लगाए गए थे सीसीटीवी कैमरे
यमुना एक्सप्रेसवे पर गौतमबुद्घ नगर की सीमा में 50 लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे। तब यह दावा किया गया था कि कैमरे की नजर से कोई नहीं बच पाएगा। चाहे वाहनों की रफ्तार कितनी भी तेज हो।
परिवहन विभाग की ओर से यमुना एक्सप्रेसवे पर तेज रफ्तार और नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर कार्रवाई के लिए इंटरसेप्टर से चालान किए जा रहे हैं। अगस्त में अन्य माह के मुकाबले वाहनों के उल्लंघन में कमी आई है। हालांकि एक मर्सडीज कार का चालान केवल इस वजह से नहीं हो सका है क्योंकि उसकी रफ्तार 195 किलोमीटर प्रति घंटे की थी।
- हिमेश तिवारी, एआरटीओ प्रवर्तन