साइबर सिटी के लोग आवारा कुत्तों और बंदरों के आतंक से खौफजदा है। हर घंटे जिले में एक व्यक्ति कुत्ते या बंदर के काटने का शिकार हो रहा है। बीते 06 वर्षों में करीब 1357 फीसदी से अधिक कुत्ते और बंदर काटने के मामले में इजाफा हुआ है।
इनसे निपटने के लिए जिला प्रशासन के किसी भी अमले के पास कोई ठोस बंदोबस्त नहीं है। बता दें कि कुरुक्षेत्र में आवारा कुत्तों के झुंड ने एक व्यक्ति को बुरी तरह से नोंचा, जिससे मौके पर उसकी मौत हो गई।
दरअसल, गुरुग्राम के पुराने इलाके में आवारा कुत्तों का अधिक आतंक है, जबकि डीएलएफ, पालम विहार, सुशांत लोक जैसे पॉश इलाके में बंदरों से लोग खौफजदा हैं। इनके काटने के बाद लोग एंटी रेबिज के इंजेक्शन के लिए सरकारी अस्पताल या निजी अस्पताल पहुंच रहे हैं।
40 हजार कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है
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- फोटो : अमर उजाला
आवारा कुत्तों के लिए ठोस बंदोबस्त नहीं होने के कारण खौफ के साए में लोग रहते हैं। कुत्तों की पैदाइश पर रोकथाम करने के लिए नगर निगम कार्रवाई कर रहा है, लेकिन इनकी संख्या में कोई खास गिरावट नहीं है।
बंदरों के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। नगर निगम का दावा है कि 2009 से नसबंदी अभियान शुरू किया गया था। अब तक करीब 40 हजार कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है।
आंकड़ों के मुताबिक 2010 में 698 मामले एंटी रेबिज के सामने आए थे। जिनमें कुत्ता और बंदर दोनों के काटने के थे। वर्ष 2016 में यह 9354 मामले सामने आए। 2015 में दोनों सिविल अस्पताल में 7809 मामले आए थे। 2014 में 5438 कुत्ते व बंदर के काटने के मामले दर्ज किए गए थे।
स्वास्थ्य विभाग पर है अतिरिक्त भार
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आंकड़ों से साफ है कि जिले में औसतन हर दिन 24 मामले आते हैं। यानी हर घंटा एक व्यक्ति कुत्ता या बंदर के काटने का शिकार होता है। प्रशासनिक लापरवाही का आलम है कि स्वास्थ्य विभाग पर इसका अतिरिक्त भार पड़ रहा है।
कुत्ते व बंदर काटने के मामले में बढ़ोतरी के साथ एंटी रेबिज इंजेक्शन की मांग बढ़ गई है। प्रति वर्ष 15 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है। कुत्ते काटने पर 4-6 एंटी रेबिज इंजेक्शन लगाए जाते हैं।
जो मार्केट में 350 रुपये में मिलता है, जबकि सिविल अस्पताल में महज 100 रुपये में दिया जाता है। स्टॉक खत्म होने की सूरत में अस्पताल ओपन मार्केट से खरीदकर मरीजों को देता है।
नसबंदी का कार्यक्रम भी जारी है
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वाईएस गुप्ता, संयुक्त आयुक्त (मुख्यालय), नगर निगम: जिले में आवारा कुत्तों के नियंत्रण के लिए अभियान चल रहा है। हर वार्ड के हिसाब से एक टीम है। जिसकी निगरानी सेनिटेशन विभाग कर रहा है। नसबंदी का कार्यक्रम भी जारी है। कुछ दिनों में इसका असर दिखने लगेगा।