प्रो. नीतू के मुताबिक, पराली जलाने के चलते आम आदमी को सांस लेना दुभर हो जाता है। प्रदूषण के चलते किसानों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। हालांकि अब किसान को जब पराली से पैसा मिलेगा तो वह उसे नहीं जलाएगा। इसके लिए एक मशीन लगेगी, जिसे आठ से दस किसान मिलकर लगा सकते हैं।
मशीन पराली को काटेगी, जिसमें आईआईटी दिल्ली द्वारा पेंटेंट कैमिकल को डाला जाएगा। इस पराली से पल्प के साथ-साथ लिगमिन तैयार होगा। प्रो. नीतू के मुताबिक एक एकड़ जमीन से करीब दो टन पराली निकलती है तो उसका एक टन पल्प तैयार होगा।
पेपर मेकिंग प्लांट वाले 45 रुपये प्रति किलो के आधार पर पल्प खरीदते हैं। मतलब किसान घर बैठे बेकार पराली से 45 रुपये प्रति किलो कमा लेंगे। जबकि लिगमिन बैटरी या फैबीकॉल आदि तैयार करने में प्रयोग होगा।
लिगमिन मार्केट में 70 रुपये प्रति किलो के आधार पर बिकता है। बता दें कि पेपर मैकिंग प्लांट वाले इस प्लप से बोर्ड, कप, प्लेट, कटोरी आदि तैयार करते हैं, जोकि फूड ग्रेन टेस्टिंग में सभी मानकों पर खरे उतर हैं।