केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के बयान के बाद दिल्ली भाजपा में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों पर चर्चा तेज हो गई है। कई दावेदारों के बीच प्रदेशाध्यक्ष मनोज तिवारी का नाम अचानक उछला तो इस पर भाजपा में अंदरूनी राजनीति भी तेज हो गई।
यह भी चर्चा शुरू हो गई कि चुनाव सह-प्रभारी के माध्यम से आलाकमान ने अंदरखाने मैसेज दे दिया है कि मुख्यमंत्री पद की दावेदारी छोड़कर भाजपा नेता चुनावी जीत पर ध्यान केंद्रित करें।
भाजपा विधानसभा चुनाव में किसी चेहरे के साथ उतरेगी या बिना चेहरे के, स्थिति अभी साफ नहीं है। इसी बीच पुरी के बयान के अलग-अलग मायने-मतलब निकाले जा रहे हैं। पार्टी के भीतर ही खलबली मच गई है।
पार्टी नेता ही पुरी के बयान पर दबी जुबान में कह रहे हैं कि केंद्रीय नेतृत्व ही तय करेगा कि चुनाव किसी चेहरे के साथ लड़ा जाएगा या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर।
वे यह भी दलील दे रहे हैं कि पिछले दो चुनाव में डॉ. हर्षवर्धन व किरण बेदी को पार्टी ने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था तो वह सत्ता पर काबिज नहीं हो सकी थी। लिहाजा पार्टी को प्रधानमंत्री के नाम पर ही चुनाव लड़ने की आवश्यकता है।
उधर, मनोज तिवारी का नाम आने पर पूर्वांचली नेता खुशी जाहिर कर रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान अबकी बारी मनोज तिवारी के नारे लगे तो पूर्व प्रदेशाध्यक्ष विजय गोयल, विजेंद्र गुप्ता, केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के साथ ही सीएम पद के दावेदार सांसदों के खेमे में भी मायूसी रही।
हालांकि, खुलकर किसी ने कोई बयान नहीं दिया है। मनोज तिवारी से इतर गुट में यह चर्चा जरूर है कि किसी चेहरे को पेश कर पार्टी चुनाव लड़ती है तो दूसरे गुट से भितरघात का खतरा रहेगा। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान यह खुलकर सामने आ गया था।
उधर, यह भी माना जा रहा है कि दिल्ली अब बदल चुकी है। पूर्वांचली मतदाताओं का राजनीति में दबदबा हो गया है। अनधिकृत कॉलोनियों की रजिस्ट्री शुरू होने के बाद इनमें रहने वाले मतदाताओं, जो ज्यादातर पूर्वांचली व अन्य राज्यों के हैं, का वोट सीधे तौर पर भाजपा की झोली में आएगा।
साथ ही, भाजपा के जो कैडर वोट हैं, उनमें अन्य पार्टियां सेंध नहीं लगा सकतीं। ऐसे में तिवारी को मुख्यमंत्री का चेहरा पेश करना राजनीतिक भूल नहीं साबित होगी।