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गांव-कस्बों में नोटबंदी की ऐसी पड़ी है मार कि किसान से लेकर मजदूर तक परेशान

Thu, 01 Dec 2016 02:00 PM IST
भूपेंद्र कुमार/अमर उजाला, फरीदाबाद

सार

विशेष पेज के लिए-फोटो लाल सिंह के पास हैं, हुक्का गुड़गुड़ाते ग्रामीण और एक ईंट भट्ठा मजदूर का फोटो
मुख्य शीर्षक-सरकार गांवों-कस्बों में नकदी बढ़ाए तब बनेगी बात
सबहैड-ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था डगमगाई, किसान और मजदूर डिजिटल क्रांति से कोसों दूर
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- फोटो : लाल सिंह
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विस्तार
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क्या नए नोट बाजार में आ गए हैं, हमें कब तक मिल जाएंगे? यह सवाल जब पलवल के पास ईंट भट्ठे पर काम कर रहे मजदूर जमशेद ने किया तो...आसपास खड़े लोगों में किसी के पास भी जवाब नहीं था। ग्रामीण इलाकों में हालात कितने खराब हैं इसका एहसास राजधानी दिल्ली से 50 किलोमीटर बाहर के ग्रामीण इलाके में होता है।
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जानकारों का कहना है कि रबी के सीजन की शुरुआत में बड़े नोट बंद करने के फैसले की सबसे कड़ी मार किसानों और खेतीहर मजदूरों पर पड़ी है। किसानों को 21 नवंबर के छूट दी गई कि वे पुराने नोट देकर सरकार बीज और खाद केंद्रों से खरीदारी कर सकें पर यह फैसला देर से आया, तब तक बड़ा नुकसान हो चुका था।

किसान हों या मजदूर ज्यादातर लोगों को इंटरनेट बैंकिंग, डेबिट कार्ड के बारे में कोई जानकारी नहीं है। अब सरकार अगर गांवों और कस्बों के बैंकों में नकदी बढ़ाए तो अर्थव्यवस्था सुधर सकती है। जानकारों का कहना है इस मामले में जितनी देर होगी हालात बिगड़ेंगे।
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- फोटो : लाल सिंह
नूंह से पलवल जाते हुए रास्ते में सालंबा गांव पड़ता है। इस गांव में किसानों का एक गुट ताश खेलता नजर आया तो दूसरा हुक्का गुड़गुड़ाता हुआ। बातचीत की तो पता चला कि इस वक्त सरसों और गेहूं की बुआई होती पर खाद, बीज की कमी से खेती के सारे काम ठप पड़े हैं।

किसान रमजान कहते हैं, हमें फैसले से कोई दिक्कत नहीं पर पता तो चले बैंकों में कैश क्यों नहीं है। हम लाइन में लगे-लगे परेशान हो चुके हैं। हालत यह है कि ताश खेलना मजबूरी बन गया है। मजदूरों की हालत भी खराब है।

ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले जमशेद और सुभान कहते हैं, हमारे जैसे कई मजदूर हैं। हम लोग राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले हैं। यहां खेतों या भट्ठों पर मजदूरी करते हैं। किसान हों या भट्ठा ठेकेदार सब हमें पुराने नोट ही देते हैं। मजबूरी में हम लोग ले तो लेते हैं पर उन्हें चलाएं कैसे।
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गांधी ग्राम घासेड़ा में भी असंतोष

- फोटो : लाल सिंह
बस फिर 500 के नोट को 300 में दुकानों पर चलाना पड़ता है। हमारे पास कोई बैंक खाता नहीं है। दरअसल ग्रामीण इलाकों में कम बैंक होने से भी हालात बिगड़े हैं। यह सभी जानते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था नकद से ही संचालित होती है। अब इसकी कमी से हालात गड़बड़ा गए हैं।

गांवों और छोटे कस्बों में डेबिट, क्रेडिट कार्ड तो छोड़िए लोग चेक तक का इस्तेमाल करना नहीं जानते। गुरुग्राम के पास सोहना कस्बे में एक दुकानदार का कहना है हमारे यहां शायद ही किसी दुकान में आप स्वैप मशीन पाएं, यह पूरी तरह देहाती मार्केट है जहां सिर्फ कैश चलता है।

यही वजह है कि बड़े नोट बंद होने के एक-दो हफ्ते तक तो लोगों ने हालत बेहतर होने के इंतजार किया पर अब बेचैनी बढ़ रही है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के जानकारों का कहना है कि सरकार अब जल्दी से जल्दी गांवों और छोटे कस्बों तक कैश पहुंचाए। लोगों की जेब में नकदी होगी तो खरीदारी बढ़ेगी। इससे हालात सामान्य होने में मदद मिलेगी।

कभी महात्मा गांधी ने 1947 में विभाजन के बाद घासेड़ा में मेवों की जनसभा को संबोधित किया था और उनसे पाकिस्तान नहीं जाने की अपील की थी। इस तथ्य से आज भी गांववाले बखूबी वाकिफ हैं और गर्व का भाव रखते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि बड़े नोट बंद होने के बाद बेहद तंगी के हालात में जी रहे हैं। गांव में ज्यादातर लोगों के पास खाते नहीं हैं। जिनके पास हैं वे एटीएम कार्ड को नहीं जानते। नाराजगी इसे लेकर भी है कि सब काम ठप हो गए हैं। एक बुजुर्ग कहते हैं, बैंकों में पैसे आ जाएं तो काम फिर शुरू हो जाएंगे। 
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