दिल्ली से सड़क के रास्ते होते हुए अगर आप सिकंदराबाद की ओर जाएं तो रास्ते में पतलाखेड़ा गांव मिलेगा। बाहर से दिखने में ये गांव संपन्न और खुशहाल दिखता है क्योंकि किसानों के पक्के और बड़े मकान हैं और बाहर कार भी खड़ी दिख जाएंगी।
इसी गांव के बाजार में घुमते हुए हम एक चाय की दुकान पर रुके। पवन टी-स्टॉल को 18 साल का एक युवा चला रहा था। हमने उसे चाय ऑर्डर की तो कुछ देर तो उसने जवाब ही नहीं दिया। सिर घुसाए मोटे से रजिस्टर में वो न जाने क्या लिखे जा रहा था। हमने दोबारा आवाज दी तो खीझ कर बोला अरे रुक जाओ, पहले उधारी लेने वालों का हिसाब तो लिख लूं।
तभी हमारी निगाह उसके रजिस्टर पर पड़ी तो देखा पूरा पन्ना उधारी के हिसाब से भरा पड़ा है। न चाहते हुए भी हमें पूछना ही पड़ा कि आखिर नोटबंदी का उसके व्यवसाय पर कैसा असर पड़ा है तो उसने रजिस्टर दिखाते हुए कहा, 'देख लो यही असर हुआ है। पैसे तो बस बही में ही आ रहे हैं नकद के तो दर्शन हो ही ना रहे और नए वाले (नोट)तो मिलने से पहले ही लुट जा रहे।'
दयाराम
- फोटो : अमर उजाला
चाय पीने के बाद हम गांव में चले तो घर के दालान में एक बुजुर्ग चारपाई पर बैठे ऊंघ रहे थे। हमें देखते ही वो उठने लगे और सामने पड़ी खाट पर बैठने को कहा। हम अखबार से हैं, बस ये देखने आए हैं कि नोटबंदी के बाद गांव में रोजाना का काम-धाम कैसे चल रहा है।
किसानी करने वाले दयाराम ने बताया कि मंडी में धान रख आए हैं। पैसे नहीं मिले हैं क्योंकि आढ़तिए ने साफ कह दिया कि जब बिक जाएंगे तभी पैसे मिलेंगे। हां, उसने ये जरूर कहा कि अगर ज्यादा जल्दी है तो हजार-पांच सौ के पुराने नोट पड़े हैं चाहो तो ले जाओ।
दयाराम को पेरशानी इस बात से नहीं है कि नोटबंदी के बाद गांवों से नकद गायब हो गए हैं उन्हें परेशानी इस बात की है कि इसके बाद वो कई दिन तक लगातार ओरियंटल बैंक गए लेकिन उन्हें कैश नहीं मिल पाया। लंबी लाइन में पूरे दिन खड़े रहे लेकिन नंबर आने से पहले ही बैंक में नए नोट खत्म हो जाते।
इस बीच उनका नाती रोहित भी आ गया। रोहित बीए कर रहा है। उसने बिना पूछे ही बताना शुरु कर दिया कि दादा के साथ वो भी लाइन में लगा रहा लेकिन उसे भी नए नोट के दर्शन न हो सके। नोटबंदी को आज पूरे 15 दिन हो चुके हैं और इस परिवार ने अभी तक नई करेंसी के दर्शन नहीं किए हैं।
एहसान
- फोटो : अमर उजाला
हम गांव से बाहर निकले और दिल्ली की ओर वापस चल दिए। कुछ दूर ही चले थे कि सड़क किनारे साहनी बैंड, बग्घी, डीजे की दुकान दिखी। सोचा इनसे भी बात करते चलें। दुकान के सामने खाट पर चार लोग बैठे गप्प लड़ा रहे थे। उनमें से एक (एहसान) से जब हमने पूछा कि नोटबंदी का धंधे पर कैसा असर है तो जवाब आया, 'अरे साहब, क्या बताएं।
जहां जाओ बस हजार और पांच सौ के पुराने नोट थमा दिए जाते हैं। बुराई नोट लेने में नहीं है लेकिन जब उससे सामान खरीदने जाओ तो दुकान वाला कहता है हजार के आठ सौ ही मिलेंगे, लेने हैं तो बताओ। मरता क्या न करता, आठ सौ रुपये में ही राशन लाना पड़ा। हफ्ते भर के बाद नोट के दर्शन हुए तो वो भी पुराने वाले।'
एहसान ने बताया कि बैंड हाउस में करीब 15 लोग काम करते हैं और सभी को पेमेंट में पुराने नोट ही मिल रहे हैं। पुराने नोट में पांच सौ के बदले चार सौ और हजार के बदले आठ सौ का ही सामान मिल रहा। चौंकाने वाली बात ये है कि इनमें से किसी ने भी अभी तक पांच सौ और दो हजार के नए नोट के दर्शन नहीं किए हैं।
इन सबका का कहना है कि बैंको में लग कर हमने भी पुराने नोट जमा करने की कोशिश की लेकिन जब-जब बैंक गए खाली हाथ ही वापस आना पड़ा। नंबर आने से पहले ही नए नोट खत्म हो जाते। पुराने जमा कर देते तो खाते क्या इसलिए उन्हें ही लेकर वापस चले आए। जब हम चलने लगे तो उन चारों ने हमसे एक ही सवाल किया, 'भाई ये लाइन कब तक खत्म हो जावेगी।'