याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कमलेश कुमार ने खंडपीठ को बताया कि धारा 56 में असमान और अनुचित संरक्षण गलत तरीके से प्रदान किया गया है। उन्होंन कहा यद्यपि एक महिला गलत है और वह डिफॉल्टर होने के बावजूद वह इस प्रावधान का दुरुपयोग कर रही है।
याचिका में कहा गया है कि इतने सारे बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) लोगों को सुविधाएं और व्यक्तिगत ऋण प्रदान करती हैं क्योंकि इन बैंकों और एनबीएफसी को भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (जी) के तहत संरक्षित किया गया है।
वहीं अब यह फैशन बन गया है कि लोग सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 56 का फायदा उठाकर जानबूझकर धोखाधड़ी करना और बैंक व एनबीएफसी को वाहनों, संपत्ति, व्यक्तिगत ऋण को लेकर नुकसान पहुंचाते है।
उन्होंने कहा महिलाएं निजी क्षमता में ऋण ले रही हैं और धन की वसूली के लिए बैंकों और एनबीएफसी को डिफाल्टरों के खिलाफ सिविल कार्यवाही करने में बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है।