उत्तर-पूर्वी दिल्ली के महज सात किलोमीटर के दायरे में हिंसा हुई। हिंसा भी ऐसी कि शायद इसके जख्म भरते-भरते कई दशक लग जाएं। उपद्रवियों ने रविवार, सोमवार और मंगलवार को जमकर बवाल काटा। एक-दूसरे समुदाय के मकानों, दुकानों, फैक्टरी, स्कूल और यहां तक धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया।
लोगों का कहना है कि 1984 और 1992 में भी ऐसी हिंसा नही हुई थी। पता नहीं उपद्रवियों पर क्या जुनून सवार हुआ। बृहस्पतिवार को जिले में शांति हुई तो लोग हिंसा के डेमेज कंट्रोल में जुट गए। हिंसा प्रभावित इलाकों में कुछ लोगों ने लंगर बांटकर भाईचारे का पैगाम दिया।
कुछ लोग गाडिय़ों में खाना-पानी और यहां तक खाने-पीने की जरूरत का सामान भी लेकर हिंसाग्रसित इलाकों में पहुंचे। कुछ मोहल्लों में दूसरे समुदाय के एक्का-दुक्का घर मौजूद थे, अब उनके पड़ोसी ऐसे लोगों को मनाकर मोहल्ला न छोडने की अपील कर रहे हैं।
घोंडा गांव निवासी दिनेश शर्मा ने बताया कि उनके गांव में पिछले कई सालों से कई मुस्लिम परिवार रहते हैं। हिंसा हुई तो कुछ लोग अपने-अपने मकानों को छोड़कर भाग गए। हालांकि कुछ लोग रुके भी रहे।
अब यह लोग अपने-अपने घरों को छोड़कर कहीं दूसरी जगह शिफ्ट करने की बात कर रहे हें। दिनेश ने बताया कि गांव के लोग इन लोगों को ऐसा न करने के लिए कह रहे हैं। उनका कहना है कि जो होना था वह हो गया। भविष्य में ऐसी नौबत अब दोबारा नहीं आएगी। बुजुर्ग महिलाएं मुस्लिम महिलाओं को गले लगाकर मनाती दिखीं। सुकमा देवी ने बताया कि उनके घर पर ही दो परिवार रहते हैं, वह उनको दूसरी जगह न जाने के लिए कह रही हैं।
मौजपुर चौक, घोंडा चौक, नूर-ए-इलाही, ब्रह्मपुरी रोड समेत दूसरे इलाकों में लोग छोटे टेंपो में लंगर बांटते हुए दिखाई दिए। इन लोगों का कहना था कि हिंसा के बाद कई इलाकों में अघोषित कफ्र्यू लग गया था। जिसकी वजह से कई लोगों के घर में खाने को भी नहीं था। 65 साल के मेहफूज ने बताया कि वह गामड़ी गांव में रहते हैं, उनके घर में तीन सदस्य हैं। सोमवार से ही घर में खाने को कुछ नहीं था।
बृहस्पतिवार को थोड़ा हालत बेहतर हुए तो वह खाने की तलाश में निकले। घोंडा चौक के पास मंदिर के सेवादार खाना बांट रहे थे। वह उनसे खाना लेकर आए। मेहफूज खाना बांटने वाले लोगों को भरपूर दुआएं दे रहे थे।