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Delhi : कैंसर और सांस रोगों का इलाज होगा आसान, आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं ने की महत्वपूर्ण खोज

Mon, 24 Feb 2025 06:56 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली

सार

यह खोज मॉलिक्यूलर सेल जर्नल में प्रकाशित हुई है और इस रिसेप्टर को लक्षित कर नए उपचार विकसित करने में सहायक हो सकती है।
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iit kanpur - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के शोधकर्ताओं ने कैंसर और सांस की बीमारियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मानव रिसेप्टर सीएक्ससीआर2 की परमाणु संरचना को खोजने में सफलता हासिल की है। यह खोज मॉलिक्यूलर सेल जर्नल में प्रकाशित हुई है और इस रिसेप्टर को लक्षित कर नए उपचार विकसित करने में सहायक हो सकती है।

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शोध के अनुसार केमोकाइन्स छोटे सिग्नलिंग प्रोटीन होते हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को संक्रमण तक मार्गदर्शन करने में मदद करते हैं। ये प्रोटीन, कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्ली पर मौजूद विशेष रिसेप्टर्स से जुड़कर विभिन्न जैविक प्रतिक्रियाएं शुरू करते हैं। सीएक्ससीआर2 इन रिसेप्टर्स में सबसे अहम है, क्योंकि यह क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, अस्थमा और अग्नाशय के कैंसर जैसी बीमारियों से जुड़ा हुआ है। शोधकर्ताओं ने क्रायोजेनिक-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (क्रायो-ईएम) तकनीक का उपयोग कर इस रिसेप्टर की संरचना का विस्तृत अध्ययन किया है। यह खोज लॉक-एंड-की तंत्र को समझने में मदद करती है, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सीएक्ससीआर2 विभिन्न केमोकाइन्स को कैसे पहचानता और सक्रिय करता है।

विकसित हो सकता है अधिक प्रभावी और लक्षित उपचार
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस संरचना का उपयोग नए चिकित्सीय अणुओं को डिजाइन करने के लिए किया जा सकता है, जिससे अधिक प्रभावी और लक्षित उपचार विकसित किए जा सकते हैं। यह खोज अगली पीढ़ी के उपचारों के लिए एक आणविक मार्गदर्शिका प्रदान करती है, जिससे सीएक्ससीआर2 को सटीक रूप से निशाना बनाया जा सकता है और कैंसर व सांस की बीमारियों में इसकी भूमिका को सीमित किया जा सकता है।
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छोटे अणुओं और एंटीबॉडी आधारित उपचार विकसित करने में जुटी टीम
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि इस रिसेप्टर की सक्रिय अवस्था को समझने के बाद अब अत्यधिक विशिष्ट अवरोधक (इन्हिबिटर्स) विकसित किए जा सकते हैं, जो इसके कार्य को बाधित कर सकते हैं। इससे नई उपचार रणनीतियों में बड़ी प्रगति संभव होगी। आईआईटी कानपुर की टीम अब इस रिसेप्टर को निशाना बनाने वाले छोटे अणुओं और एंटीबॉडी आधारित उपचार विकसित करने में जुटी है। इन उपचारों का पहले प्रयोगशाला परीक्षण, फिर पशु मॉडल पर अध्ययन किया जाएगा। इससे कैंसर और सांस की बीमारियों के नए इलाज के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया जा सकेगा।

कीमोथेरेपी की खुराक घटाकर असरदार इलाज की नई तकनीक
इससे पहले, भारतीय वैज्ञानिकों ने कैंसर उपचार के लिए चुंबकीय हाइपरथर्मिया आधारित नई विधि विकसित की है जिससे कीमोथेरेपी की खुराक कम करते हुए उपचार की प्रभावशीलता बढ़ाई जा सकती है।नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी), मोहाली के वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को विकसित किया है जिसमें अति-सूक्ष्म चुंबकीय नैनोकण (एमडीएस) और हीट शॉक प्रोटीन 90 अवरोधक (एचएसपी90आई) का संयोजन किया गया है। यह विधि ताप आधारित कैंसर उपचार को अधिक प्रभावी बना सकती है और इसके दुष्प्रभावों को कम कर सकती है।वैज्ञानिकों ने पशु मॉडल (ग्लियोमा ट्यूमर वाले चूहे) पर इस तकनीक का परीक्षण किया।ट्यूमर इंजेक्शन के जरिए इस तकनीक को लागू करने पर आठ दिनों में ट्यूमर नियंत्रण दर पहले और दूसरे स्थानों पर क्रमशः 65 और 53 फीसदी तक पहुंच गई।यह विधि कम आक्रामक है और इसके दुष्प्रभाव अपेक्षाकृत कम होते हैं।

भविष्य की संभावनाएं
शोधकर्ताओं के अनुसार, जब ये नैनोकण (एमएनपी) वैकल्पिक चुंबकीय क्षेत्र (एएमएफ) के संपर्क में आते हैं, तो वे ट्यूमर से प्रभावी रूप से लड़ सकते हैं। शोध टीम की प्रमुख डॉ. दीपिका शर्मा के अनुसार इस नई चिकित्सा के क्लीनिकल ट्रायल की जरूरत है। यदि आगे के शोध सफल रहते हैं तो यह तकनीक कैंसर उपचार के लिए एक प्रभावी सहायक या वैकल्पिक चिकित्सा बन सकती है।

कैंसर के खिलाफ लड़ाई की नई उम्मीद
वैज्ञानिकों के अनुसार ये शोध कैंसर और सांस की बीमारियों के इलाज में एक नई उम्मीद जगाते हैं। आईआईटी कानपुर और आईएनएसटी मोहाली के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए ये अध्ययन अधिक कुशल, सहनीय और लक्षित उपचार के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। यदि इनका सफलतापूर्वक क्लीनिकल ट्रायल हो जाता है तो ये लाखों मरीजों के लिए बेहतर और सुरक्षित उपचार का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

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