चार वर्षों में बांझपन का इलाज करने में राजधानी के अस्पताल सबसे आगे हैं। एम्स सहित तमाम निजी अस्पतालों में मुंबई और अहमदाबाद से ज्यादा मरीज इलाज करा रहे हैं। 36 वर्षीय करीब 500 मरीजों पर किए गए अध्ययन के बाद नोवा ने रिपोर्ट में बताया है कि दिल्ली में 17 फीसदी अंतरराष्ट्रीय मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। केवल 5 फीसदी मुंबई और चार फीसदी चेन्नई के अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं, जबकि वर्ष 2015 में दिल्ली में ऐसे करीब 12 हजार मरीज थे लेकिन वर्ष 2017 में इनकी संख्या 25 हजार से ऊपर पहुंच गई थी।
भारतीय महिलाओं के अंडाशय की आयु छह वर्ष कम
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ड्राफ्ट कमेटी के सदस्य डॉ. मनीष बैंकर का कहना है कि यूरोप और यूके जैसे देशों की महिलाओं की तुलना में भारतीय महिलाओं के अंडाशय की आयु छह वर्ष कम है, इसलिए देश में बांझपन की समस्या ज्यादा है। एम्स की वरिष्ठ डॉक्टर के अनुसार सालाना करीब 1100 मरीज बांझपन के इलाज के लिए एम्स पहुंचते हैं। इनमें ज्यादातर महिलाओं की आयु 35 वर्ष से ऊपर है। उनका कहना है कि बांझपन पुरुष और महिला दोनों में होता है, जिन्हें आईवीएफ के जरिए इलाज मिलता है। वहीं, सर गंगाराम अस्पताल की डॉ. आभा मजूमदार का कहना है कि कुछ समय से उनके यहां भी मरीजों की संख्या बढ़ी है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र तक के मरीज यहां पहुंच रहे हैं।
मरीजों के साथ अपराध भी बढ़ रहे
एम्स के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि पिछले दिनों दिल्ली क्राइम ब्रांच ने जिन रैकेट का खुलासा किया था, वह वाकई चौंकाने वाले थे। मरीजों के साथ इसे लेकर अपराध भी बढ़ रहे हैं जो चिंता का विषय है। लेकिन इसकी वजह से चिकित्सा पद्धति को दोषी ठहराना उचित नहीं है। कुछ मामलों को छोड़ दें तो चिकित्सा अब परिवारों को दुनिया की सबसे बड़ी संतान की खुशी भी दे रही है।