एसआरसीसी छात्र यूनियन की ओर से बिजनेस कॉन्क्लेव का आयोजन किया जा रहा है। इसमें अमर उजाला एक्सीलेंस पार्टनर है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इससे पानी की कमी हो रही है।
एसआरसीसी बिजनेस कॉन्क्लेव 2025 में छात्रों को संबोधित करते पर्यावरणविद सोनम वांगचुक और उनके साथ हैं एचआईएएल की मुख्य कार्यकारी अधिकारी गीतांजलि जेबी। इस कार्यक्रम में अमर उजाला एक्सीलेंस पार्टनर रहा।
- फोटो : भूपिंदर सिंह, अमर उजाला
पर्यावरणविद सोनम वांगचुक ने कहा कि परिस्थितिकी सीमा में रहकर व्यापार और अर्थशास्त्र होना चाहिए। लद्दाख हिमालय का ताज है। लद्दाख पूरी दुनिया से अलग है।
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सालभर में आधा समय लद्दाख दुनिया से कटा रहता है। छोटे-छोटे गांवों में पांच-पांच घर मिलेंगे। यह आपके विचार से कहीं अधिक दूरस्थ स्थान है। अलग-अलग समय पर शून्य से -35 डिग्री के तापमान में रहकर लोग जीवन यापन करते हैं। यह बातें उन्होंने शुक्रवार को श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) के बिजनेस कॉन्क्लेव 2025 में आयोजित एक सत्र में कहीं।
एसआरसीसी छात्र यूनियन की ओर से बिजनेस कॉन्क्लेव का आयोजन किया जा रहा है। इसमें अमर उजाला एक्सीलेंस पार्टनर है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इससे पानी की कमी हो रही है। सूखे और बाढ़ के हालात बन रहे है। उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की तरह यह तीसरा ध्रुव है जहां पर 50 हजार ग्लेशियर है। पृथ्वी पर लोगों की आबादी ग्लेशियर से निर्भर करती है। अगर समतल इलाकों में तापमान एक डिग्री बढ़ेगा तो पर्वतीय इलाकों में वह तापमान तीन डिग्री होगा। उन्होंने चिंता व्यक्ति करते हुए कहा कि शहरों का ब्लैक कार्बन ग्लेशियर तक पहुंच रहा है। इससे ग्लेशियर पिघल रहे है। आने वाले समय में उत्तरी क्षेत्र की पूरी आबादी प्रभावित होगी। नदियां मौसमी बन जाएगी।
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लद्दाख की खूबसूरती और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने कहा कि लद्दाख में पर्यटक की जगह यात्री बनकर जाए। वहां की चीजों को जाने और अध्ययन करें। अगर कुछ भी सीखे तो उसे तीन जगहों पर लागू करना न भूले। हमेशा मानवता और प्रौद्योगिकी के साथ सहयोग करें। वहीं, सत्र को संबोधित करते हुए एचआईएएल की मुख्य कार्यकारी अधिकारी गीतांजलि जेबी ने कहा कि जो दिल्ली में बनता है उसे लद्दाख में नहीं बना सकते है। युवा शहरों की ओर जा रहे हैं। लद्दाख आने वाले पर्यटकों को वहां की व्यवस्था के अनुसार ढलना चाहिए।