जब 70 से 90 फीसदी लोगों में बीमारी के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है, यानी लोगों के शरीर बीमारी के खिलाफ एंटीबॉडी बना लेता है। इस स्थिति को हर्ड इम्यूनिटी कहा जाता है। इससे अन्य लोगों में बीमारी का प्रसार नहीं होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोना वायरस से लोगों के बीच हर्ड इम्यूनिटी तभी बन पाएगी जब 70 फीसदी से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हों, हालांकि इस आंकड़े को लेकर अभी विशेषज्ञों में एक राय नहीं है।
लोगों के शरीर में एंटीबॉडी बन जाने से संक्रमण का खतरा रहता कम
सफदरजंग अस्पताल के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर जुगल किशोर बताते हैं कि इंसानों के किसी समूह के अधिकतर लोग अगर संक्रमण से इम्यून हो जाएं, उनके शरीर में एंटीबॉडी हो, तो अन्य लोगों तक वायरस का पहुंचना बहुत मुश्किल होता है। अगर दिल्ली की 50 से 70 प्रतिशत आबादी कोरोना वायरस से संक्रमित होकर ठीक हो जाए तो बाक़ी की 30 से 50 प्रतिशत आबादी को खतरा कम होगा। हालांकि इससे संक्रमण खत्म नहीं होगा, लेकिन उसका प्रसार काफी कम हो जाएगा।
दूसरी तरफ लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में कम्युनिटी मेडिसिन के डॉक्टर शिवजी देव बर्मन के मुताबिक, इम्यूनिटी का मतलब यह है कि व्यक्ति को संक्रमण हुआ और उसके बाद उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ने वायरस का मुक़ाबला करने में एंटीबॉडी तैयार कर ली। जैसे-जैसे ज्यादा लोग इम्यून होते जाते हैं, वैसे-वैसे संक्रमण फैलने का खतरा कम होता जाता है।
27 जून से 10 जुलाई के बीच हुआ था पहला सर्वे
राजधानी में 27 जून से 10 जुलाई के बीच सीरो सर्वे का पहला चरण हुआ था,जिसमें करीब 24 प्रतिशत लोग कोविड-19 से प्रभावित मिले थे। एक चौथाई लोगों में एंटीबॉडी विकसित होने की बात सामने आई थी। इसका मतलब था कि वे संक्रमित हुए और ठीक हो गए। जिन लोगों के नमूने लिए गए थे, उनमें से अधिकतर लोगों को नहीं पता था कि वे संक्रमित थे। इसके बाद दिल्ली सरकार ने फैसला किया था कि लोगों में एंटीब़ॉडी का स्तर पता लगाने के लिए अब हर महीने सीरो सर्वे होगा। इससे पता चल सकेगा कि अब कितने फीसदी लोगों में संक्रमण के खिलाफ एंटीबॉडी बन रही है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि दिल्ली हर्ड इम्युनिटी की तरफ कितना बढ़ रही है।