एसीपी गोकुलपुरी, अनुज कुमार ने 24 फरवरी को दिल्ली हिंसा के दौरान अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें (डीसीपी शहादरा, अमित शर्मा को) अस्पताल ले जा रहा था, क्योंकि वह घायल थे। दंगाई पथराव कर रहे थे, इस दौरान मुझे भी सिर पर चोट लगी। हमें नहीं पता था कि रतन लाल को गोली लग गई थी। हम रतन लाल को जीटीबी अस्पताल ले गए, जहां उसे बचाया नहीं जा सका और बाद में डीसीपी को मैक्स अस्पताल ले जाया गया।
उन्होंने बताया कि हजारों दंगाईयों की भीड़ के सामने हम केवल 200 पुलिसकर्मी ही मौजूद थे। अनुज ने बताया कि पुलिसकर्मियों की संख्या दंगे की जगह पर बहुत कम थी, वहां युद्ध जैसे स्थिति बन गई थी। दंगाई, लोगों के घरों, दुकानों, वाहनों पर पत्थरबाजी कर रहे थे।
बता दें कि एसीपी अनुज कुमार को दो दिन पहले ही अस्पताल से छुट्टी मिली है। उन्होंने बताया कि हमे निर्देश मिले थे कि सिग्नेचर ब्रिज और गाजियाबाद को जोड़ने वाली सड़क को बंद ना होने दिया जाए। मगर धीरे-धीरे भीड़ बढ़ने लगी, भीड़ में 20 से 25 हजार महिला और पुरुष शामिल थे। मुझे यह नहीं पता कि भीड़ पहले की तरह सुनियोजित थी कि नहीं।
अनुज ने बताया कि हमने भीड़ से शांतिपूर्ण तरीके से बात करने का प्रयास किया कि वे मुख्य सड़क छोड़कर सर्विस लेन पर आ जाए। मगर तब तक भीड़ में यह अफवाह फैल गई कि पुलिस की गोलीबारी में कुछ महिला और बच्चों की जान चली गई है। ब्रिज के पास निर्माण कार्य हो रहा था, जिसके चलते वहां ईंट और पत्थर रखे थे। दंगाईयों ने अचानक से पत्थरबाजी शुरु कर दी, जिसमें डीसीपी समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।
एसीपी ने आगे बताया कि पुलिस ने भीड़ पर आंसू गैंस के गोले दागे, ताकि भीड़ तितर बितर हो जाए, पर हमारा प्रयास व्यर्थ गया क्योंकि भीड़ और हमारे बीच में फासला बहुत अधिक था। हम सड़क के एक किनारे पर खडे थे जबकि भीड़ दूसरे किनारे पर थी। हम नहीं चाहते थी कि हम गोली चलाए क्योंकि भीड़ में महिलाएं भी शामिल थीं।
उन्होंने बताया कि उस समय मेरी पहली प्राथमिकता थी कि पहले डीसीपी को अस्पताल पहुंचाया जाए क्योंकि उनके शरीर से लगातार खून बह रहा था। मगर हम किसी भी दंगाई को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते थे।
बता दें दिल्ली हिंसा में पुलिसकर्मी रतनलाल सहित अबतक 42 लोगों की जान चली गई है जबकि 200 से ज्यादा लोग घायल हैं। दिल्ली हिंसा की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के अंतर्गत दो एसआईटी गठित की गई है।