तीन चरणों में लागू होगी योजना
पहले चरण में 12 महीनों के भीतर पांच ट्रैफिक कॉरिडोर पर 250 एडैप्टिव सिग्नल जंक्शन और 271 प्रवर्तन बिंदु स्थापित किए जाएंगे। दूसरे चरण में 18 महीनों के भीतर सात और कॉरिडोर, 222 सिग्नल जंक्शन और 236 एनफोर्समेंट प्वाइंट जोड़े जाएंगे। अंतिम चरण में 30 अतिरिक्त कॉरिडोर, 620 सिग्नल जंक्शन और 522 प्रवर्तन स्थल आईटीएमएस से कवर होंगे। अधिकारियों का कहना है कि चरणबद्ध कार्यान्वयन से मौजूदा ट्रैफिक संचालन में न्यूनतम व्यवधान होगा और तकनीक को क्रमिक रूप से एकीकृत किया जाएगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि सिग्नल सिंक्रोनाइजेशन और रियल-टाइम ट्रैफिक मॉनिटरिंग प्रभावी रही, तो वाहन रुकने-चलने की स्थिति कम होगी, जिससे ईंधन खपत और प्रदूषण दोनों में कमी आ सकती है। दिल्ली पुलिस पहले भी चुनिंदा चौराहों पर स्मार्ट सिग्नल का पायलट परीक्षण कर चुकी हैं।
ईंधन खपत आर धुआं दोनों बढ़ाता है जाम
दिल्ली में जाम के दौरान वाहनों का बार-बार रुकना और तेज गति से आगे बढ़ना ईंधन खपत और धुआं दोनों बढ़ाता है। परिवहन विशेषज्ञ डॉ अनिल छिकारा का मानना है कि यदि औसत गति को स्थिर रखा जाए और चौराहों पर प्रतीक्षा समय घटे, तो कार्बन और नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। आईटीएमएस के तहत कंट्रोल सेंटर को रियल-टाइम डेटा मिलेगा, जिसके आधार पर भीड़भाड़ वाले मार्गों पर ट्रैफिक डायवर्जन की सलाह दी जा सकेगी। इससे वाहनों की लंबी कतारें बनने से पहले ही दबाव को दूसरे मार्गों पर वितरित किया जा सकेगा।
उल्लंघनों की स्वतः होगी पहचान
एएनपीआर आधारित प्रणाली से बिना हेलमेट, रेड लाइट जंप, ओवरस्पीडिंग और अन्य उल्लंघनों की पहचान स्वतः होगी। इससे ऑन-द-स्पॉट विवाद कम होंगे और कार्रवाई अधिक पारदर्शी बनेगी। हालांकि, निजता और डेटा सुरक्षा को लेकर प्रश्न भी उठ सकते हैं। अधिकारियों का कहना है कि डेटा उपयोग के स्पष्ट प्रोटोकॉल और सीमित एक्सेस नियंत्रण के साथ प्रणाली संचालित की जाएगी।
यह होंगे फायदें
सिग्नल टाइमिंग लाइव ट्रैफिक के अनुसार बदलेगी ।
भीड़ वाले मार्गों पर डायवर्जन की सलाह दी जा सकेगी ।
रुकने का समय घटेगा ।
औसत गति स्थिर रखने में मदद मिलेगी।