दिल्ली मेट्रो में तैनात सिपाही मुकेशी बताती हैं कि उनके लिए सकुन का पल तब होता है जब वह किसी परिवार के दिल के टूकड़े को उनसे मिलवाती है। परिवार उन्हें दिल से दुआ देता है। आमतौर पर परिवार से बिछड़े बच्चों को ढूंढने का कार्य आसान नहीं होता। खासतौर पर ऐसे बच्चे जिनका लोकेशन की सटीक जानकारी नहीं हो, ऐसे बच्चे को ढूंढना भूसे की ढेर में सुई तलाशने जैसा होता है। लेकिन पीड़ित परिवार के भरोसे और पुलिस अधिकारियों की सहयोग से कार्य आसान हो जाता है।
मुकेशी बताती है कि उसकी बेटी जब एक साल की हुई तब से उसे दौरे पड़ते हैं। अपने बच्चे का दुखदर्द ही उनके लिए प्रेरणा का काम किया और वह अब कई परिवारों से दुआ ले रही हैं। मुकेशी बताती है कि इस काम के लिए उनके पति और परिवार की सदस्य प्रेरित करते हैं और उसके बाद वह इसके लिए दिन रात एक कर देती है। इस वर्ष जनवरी माह से उन्होंने 16 बच्चों को उनके परिवार को सौंप चुकी है।
मेट्रो पुलिस में तैनात हवलदार सीमा बताती हैं कि एक परिवार का बच्चा जब बिछड़ जाता है तो परिवार पूरी तरह से टूट जाता है। ऐसे में वह यह अपेक्षा करता है कि कोई करिश्मा हो और उसका बच्चा वापस मिल जाए। हम मिशन समझकर बच्चे की तलाश करते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है। बच्चे के मिलने पर जैसी खुशी परिवार वालों को होती है, वैसी खुशी उन्हें भी मिलती है। परिवार उन्हें इस सच्चे काम के लिए आर्शीवाद देता है।
सीमा बताती है कि इस अभियान में वरिष्ठ अधिकारियों का पूरा सहयोग रहता है, जिसकी बदौलत वह अब तक 53 बच्चों को उनके परिवार से मिलवा चुकी है। बच्चों को तलाशने में अनुमान और एक साक्ष्य से दूसरे साक्ष्य का मिलाना काफी महत्वपूर्ण होता है तभी बिछड़े बच्चों तक पहुंच पाना संभव है। इस काम में परिवार वाले भी उन्हें पूरा सहयोग करते हैं।