कभी ट्रेन से जो दूरी महज 500 रुपये में तय होती थी, सड़क के रास्ते उसी पर 9,000 खर्च होते हैं। अपनी गाड़ी न होने से सड़कों पर समय भी बेहिसाब लग जाता है। दिल्ली-एनसीआर के बीच रोजाना सफर करने वाले लोगों को कोविड-19 ने सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की इस हकीकत से भी रूबरू करवाया है। परिवहन का माध्यम बदलते ही एक ही दूरी के किराए में जमीन-आसमान का फर्क आ गया। जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का विकास ही इस मकसद से किया गया था कि आवाजाही का बेहतर विकल्प देकर दिल्ली की आबादी को तेजी से बढ़ने से रोका जाए। दिलचस्प यह कि एनसीआर प्लानिंग बोर्ड नाम की संस्था 1985 से ही इसके लिए काम भी कर रही है। दिल्ली-एनसीआर के परिवहन के मौजूदा हालात पर रोशनी डालती अमर उजाला संवाददाता
नवनीत शरण की रिपोर्ट...
केस नंबर-1: गाजियाबाद टू शिवाजी पार्क
गाजियाबाद स्थित विजय नगर के योगेश सिंह शिवाजी पार्क के एक अस्पताल में एक्जक्यूटिव हैं। पहले 500 की एमएसटी पर तीन महीने तक गाजियाबाद-शकूरबस्ती के बीच रोजाना सफर करते थे। घर और ऑफिस से रेलवे स्टेशन पैदल की दूरी पर था। लेकिन ट्रेन की बंदी व समय पर ऑफिस पहुंचने के दबाव में वह मेट्रो पर शिफ्ट हो गए। इसके लिए उनको पहले विजय नगर से हिंडन मेट्रो स्टेशन पहुंचना होता है। जहां से आगे का सफर तक करते हैं। मेट्रो होने से समय तो कमोवेश एक साल लगता है, लेकिन किराया हर दिन को 110 से ऊपर पहुंच जाता है।
केस नंबर-2: रोहतक से नई दिल्ली
रोहतक के पारस अरोड़ा नई दिल्ली शेयर मार्केट में काम करते थे। रेलवे की सुविधा होने एक महीने की एमएसटी 500 रुपये में बन जाती थी। एक्सप्रेस और पैसेंजर दोनों ट्रेनों से वह रोजाना डेढ़-दो घंटे में दिल्ली पहुंचते थे। ट्रेन की बंदी के बाद उन्होंने सड़क की तरफ रूख किया। अब वह पहले बस से बहादुरगढ़ और उसके बाद मेट्रो से नई दिल्ली पहुंचते हैं। इस बीच उनको किराए पर ही हर दिन 230 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। जबकि हर चौक-चौराहे पर रूककर चलती बस से समय भी साढ़े तीन घंटे से ज्यादा लग जाता है। उनको उम्मीद है कि ट्रेन के पटरी पर आने के बाद ही उनका बजट लाइन पर आएगा।
ट्रेन का सफर रहता सस्ता और सुलभ
कोरोना काल को अपवाद मानें तो दिल्ली-एनसीआर में लोकल ट्रेन से प्रतिदिन करीब चार लाख लोग रोजाना पैसेंजर ट्रेन से सवारी करते हैं। दिल्ली से गुरूग्राम, गाजियाबाद, फरीदाबाद, सोनीपत, पानीपत, रेवाड़ी, मेरठ, मथुरा, रोहतक तक लोकल ट्रेन प्रतिदिन 97 ईएमयू, 10एमईएमयू, 74 पैंसेंजर ट्रेन चलती हैं। वहीं, कई साप्ताहिक, द्वि-साप्ताहिक रेलगाड़ियां उपलब्ध हैं। सबको मिलाकर इनकी संख्या हर दिन 300 के करीब हो जाती है। एक घंटे के अंदर इनसे दिल्ली के सभी रेलवे स्टेशनों तक पहुंचा जा सकता है। गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुरुग्राम, साहिबाबाद, बहादुरगढ़ से दिल्ली तक पहुंचने में महज 10 रुपये का टिकट ही लेना होता है। जबकि एमएसटी बनवाने पर यह 500 रुपये मासिक से तिमाही के बीच बैठता है।
मेट्रो का सफर पड़ता महंगा
रेलवे के तरह मेट्रो का सफर से तयशुदा समय में पूरा हो जाता है। सफर भी वातानुकूलित रहता है। लेकिन किराया इसका ज्यादा पड़ता है। एनसीआर से नई दिल्ली आने वाले ज्यादातर रूट पर एक तरफ का किराया 50-60 रुपये के स्लैब में आता है। अगर दोनों तरफ का सफर मेट्रो से करना हो तो 100 रुपये से ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। इसके बाद लॉस्ट माइल कनेक्टिविटी बड़ी अड़चन है।
बस की बेहतर सुविधा नहीं, एनसीआर के ऑटो नहीं कर पाते दिल्ली में प्रवेश, कैब पर टोल टैक्स पड़ता भारी
दिल्ली-एनसीआर में बस की बेहतर कनेक्टिविटी नहीं है। कुछ रूट पर डीटीसी ने बसें उतार रखी हैं, लेकिन इन पर फ्रीक्वेंसी खराब है। वहीं, यूपी के ऑटो दिल्ली प्रवेश नहीं कर पाते। जबकि कैब से आने पर 100 रुपये से ज्यादा टोल पर ही चुकाने पड़ते हैं। इससे सुविधा होने पर लागे निजी वाहन के विकल्प को आजमाते हैं। लेकिन किसान आंदोलन की वजह से यह माध्यम भी धोखा दे रहा है।
आठ से दस गुना बढ़ता किराया, मध्यम और निम्न आय वर्ग पर पड़ी मार
सार्वजनिक परिवहन का बेहतर विकल्प न होने की सबसे ज्यादा मार मध्यम और निम्न आय वर्ग पर पड़ती है। ट्रेन के सहारे यही दिल्ली-एनसीआर के बीच सफर करते हैं। कोरोना काल की बंदी से सबसे ज्यादा नुकसान इसी तबके को हुआ है। अचानक से आठ से दस गुना किराया बढ़ने से उसकी आवाजाही ही मुश्किल भरी हो गई है।
दिल्ली से प्रतिदिन 10 लाख यात्री करते है अवागमन
दिल्ली के स्टेशनों से आम दिनों में प्रतिदिन 10 लाख यात्री अवागमण करते है। इनमें तीन से साढ़े तीन लाख यात्री एनसीआर में अवागमण करते है। दिल्ली के स्टेशनों की फुटफॉल की बात करें तो नई दिल्ली से करीब पांच लाख, पुरानी दिल्ली 3.5 लाख, निजामुद्दीन से 1.5 लाख व आनंद विहार, सराय रोहिल्ला समेत अन्य स्टेशनों से एक लाख से कम यात्री प्रतिदिन यात्रा करते है।
विशेषज्ञ की राय, ट्रेन का विकल्प सबसे बेहतर
रेलवे में वरिष्ठ अधिकारी रहे वाईएस राजपूत मानते हैं कि रेल यात्रा किफायती और आरामदायक है। एनसीआर में ट्रेनों की संख्या भी कम नहीं है, लेकिन इनको अभी तक रफ्तार नहीं मिल पाई है। मुंबई सब-अर्बन की तरह दिल्ली लोकल नहीं बन पाई है। इसी तरह रिंग रेल दिल्ली के लिए एक बेहतर ढांचा है, लेकिन फीडर बस सुविधा के आभाव व स्टेशन तक पहुंचने में अतिक्रमण के कारण परेशानी की वजह से यह सुविधा भी दम तोड़ दी है। गर्मी के दिनों में भी लोकल ट्रेन से यात्रा करने में परेशानी यात्रियों को होती है।
डीटीसी चला रहा 300 से ज्यादा अंतरराज्यीय बसें
दिल्ली परिवहन निगम की करीब 300 अंतराज्यीय बसों का संचालन करता है। इनमें करीब 100 बसें नोएडा डिपा से चलाई जाती है। जबकि गाजीपुर, पंजाबी बाग, पीरागढ़ी समेत दूसरे डिपो की बसें भी दूसरे राज्यों में जाती है। इनसे रोजाना करीब दो लाख यात्री सफर करते हैं। इस बसों का अधिकतम किराया 25 रुपये है।