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हत्यारों ने ढूंढे शवों को ठिकाने लगाने के ऐसे-ऐसे तरीके, पुलिस भी रह गई हैरान

Tue, 28 Aug 2018 11:28 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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फाइल फोटो
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जब प्रॉपर्टी डीलर ललित जैन ने अपनी पत्नी की हथौड़ा मारकर हत्या कर दी तो वो और उसका पूरा परिवार ये सोचने में लग गया कि आखिर लाश को कहां ठिकाने लगाया जाए। बहुत सोचने के बाद वो सब इस नतीजे पर पहुंचे कि मसूरी ले जाकर लाश को किसी खाई में फेंक दिया जाए फिर गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई जाए।

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उन्होंने ये भी सोचा कि अगर किसी तरह जैन की पत्नी की लाश मिल भी जाए तो समय बीतने और इतनी दूरी की वजह से उसके शव की पहचान नहीं हो सकेगी। ललित पर किसी को शक न हो इसके लिए उसने अपनी साली और तीन साल की भतीजी को भी मसूरी जाते वक्त कार में बिठा लिया।

इसी कार में जैन ने अपनी पत्नी की लाश को पीछे वाली सीट के लेग स्पेस में रखा था। ऐसा नहीं है कि ललित जैन पहला ऐसा व्यक्ति है जिसने हत्या के बाद अपने गुनाह को छिपाने के लिए ऐसी साजिश रची। हत्यारों के व्यवहार पर किए जा रहे एक विश्लेषण में पता चला है कि अपराधी अपना गुनाह छिपाने के लिए ऐसे खतरों से भरे कदम उठा रहे हैं ताकि मृतक का पता ही न चल सके।
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मृतकों के साथ हफ्तों रहने, उन्हें आंगन में गाड़ देने, लाश को फ्रिज में रखने से दिल्ली के हत्यारे वो सबकुछ कर चुके हैं जिससे वो हत्या कर उसके बाद होने वाली सजा से बच सकें। एक आंकड़े के मुताबिक 2018 में अब तक दिल्ली में हर महीने 40 हत्याएं हुई हैं।

जब योजना बनाकर करते हैं हत्या तो ठिकाने लगाते हैं शव

सांकेतिक
हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक खबर के अनुसार पुलिस के पास इस बात का कोई आंकड़ा मेंटेन तो नहीं है कि कितनी तरह से आरोपियों ने लाशों को ठिकाने लगाया। लेकिन अधिकारियों का कहना है कि हर साल करीब दो दर्जन ऐसे मामलों से उनका पाला पड़ता है जो उन्हें भी हैरत में डाल देता है।

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता मधुर वर्मा के मुताबिक अधिकतर उन मामलों में लाशों को ठिकाने लगाने की कोशिश की जाती है जिनमें हत्याएं या तो पूरी योजना बनाकर की जाती है या गुस्से के आवेश में कर दी जाती है। क्योंकि ऐसे लोगों को पकड़े जाने का डर होता है। जो अपराधी चोरी-डकैती के वक्त या दुश्मनी निकालने के लिए अपराध को अंजाम देते हैं वो लाश को ठिकाने लगाने की फिक्र नहीं करते।

पत्नी के हत्यारोपी ललित जैन को गिरफ्तार करने वाले डिप्टी कमिश्नर असलम खान बताते हैं कि ललित और उनके परिवार ने सोचा था कि उन्होंने एक फुलप्रूफ प्लान बनाया है लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनके घर के बगल वाले घर में लगा सीसीटीवी उनकी सारी हरकतें रिकॉर्ड कर रहा है।

असलम खान ने इस साल फरवरी में सामने आए एक मामले के बारे में बताते हुए कहा कि सिविल सेवा परीक्षा का एक परीक्षार्थी अवधेश शाक्य पड़ोस में रहने वाले एक सात साल के बच्चे की लाश के साथ लगभग एक महीने तक रहा। सूटकेस में बंद लाश के साथ वह तब तक रहा जब तक कि उसके पड़ोस में एक सीसीटीवी कैमरा नहीं लग गया।

असलम खान ने बताया कि जब भी उस शव से बदबू आती तो अवधेश वह लोगों और पुलिस को बहकाने के लिए मरे चूहों को अपने कमरे में डाल देता। उस इलाके में पुलिस की तैनाती और सीसीटीवी कैमरा ने उसे कमरे से बाहर शव ले जाने का मौका ही नहीं दिया। अवधेश को लगा था कि वह घर बदलने का नाटक कर पुलिस से बच जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आखिरकार वह पकड़ा गया।

6 साल की बच्ची की रेप-हत्या के बाद सड़कों पर लेकर घूमा था शव और...

सांकेतिक फोटो - फोटो : अमर उजाला
मनोवैज्ञानिक रजत मित्रा ने बताया कि हर हत्यारे की शव को ठिकाने लगाने का तरीका अलग होता है। मित्रा दस साल पुराने एक दुष्कर्म और हत्या के मामले को याद करते हैं। इस केस में हत्यारे ने 6 साल की बच्ची का रेप कर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद हत्यारा बच्ची के शव को अपनी पीठ पर लादकर भीड़भाड़ वाली सड़क पर निडर होकर निकल पड़ा।

दो किलोमीटर चलकर वह एक पानी की टंकी के पास पहुंचा और बच्ची को उसमें फेंक दिया। वह बच्ची को लेकर इतने विश्वास के साथ रोड पर चल रहा था कि किसी को कोई शक ही नहीं हुआ। यह घटना दिल्ली के महरौली की बात है।

पुलिस का कहना है कि 2016 में दिल्ली में शव छिपाने का जो सबसे ज्यादा चलन देखा गया था वो बेड बॉक्स में, अलमारियों में या वेंटिलेशन शाफ्ट में। इस तरह का एक मामला था दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आरजू सिंह चौहान का जिसे फरवरी 2016 में मौत के घाट उतारा गया था। आरजू के कत्ल का आरोप उसके प्रेमी नवीन खत्री पर लगा। जब वह नवीन पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी तो नवीन ने आरजू की हत्या कर दी।

खत्री ने आरजू की बॉडी अपने ही घर के वेंटिलेशन शाफ्ट में छिपा कर रख दी और अपनी नई-नवेली पत्नी से आरजू के शव की बदबू को छिपाने के लिए उसने कई डियोडरेंट के बोतल खत्म कर दिए।

नैना साहनी के शव के टुकड़े तंदूर में जलाए

शैलजा मर्डर केस - फोटो : अमर उजाला
इसी तरह पिछले साल साकेत में एक बार टेंडर ने अपने सहकर्मी की हत्या कर उसके शव को रेफ्रिजिरेटर में काट कर डाल दिया। इसका खुलासा तब हुआ जब चार दिन बाद पुलिस ने उसके घर पर रेड मारी। लाशों को गाड़ना या उन्हें जला देना भी शवों को ठिकाने लगाने का आम तरीका है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण है नैना साहनी मर्डर केस। इस हत्याकांड में नैना के पति कांग्रेस युवा नेता सुशील शर्मा ने 1995 में अपनी पत्नी की हत्या कर उसके टुकड़े कर दिल्ली के एक रेस्त्रां के तंदूर में जला दिया। यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बना था और आज भी इसमें सुनवाई चल रही है।

पुलिस को अक्सर ऐसे भी मामले मिलते हैं जिनमें हत्या के बाद जानबूझकर शव को रेलवे ट्रैक पर डाल दिया जाता है। या फिर सड़क पर लाश फेंककर उसे हादसे का रूप देने की कोशिश की जाती है। इस तरह का मामला दिल्ली में जून में सामने आया था जब आर्मी मेजर की पत्नी शैलजा द्विवेदी को एक अन्य मेजर निखिल हांडा ने मौत के घाट उतार दिया था।
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कब जमीन में गाड़ते हैं शव

छानबीन करती पुलिस - फोटो : ani
शव को खाली प्लॉट में गाड़ने का तरीका भले ही पुराना हो लेकिन आज भी इसका उपयोग किया जाता है। 2016 के एक चर्चित मामले में एक व्यवसायी को दुश्मनी के चलते मौत के घाट उतार दिया गया।

उसके बाद उसका शव और मोटरसाइकिल उस जमीन पर में गाड़ दिया गया जहां डीटीसी बस का टर्मिनल बनने वाला था। हत्यारोपियों ने बताया कि उन्हें ये आइडिया दृश्यम फिल्म देखकर आया था। उन्हें लगा था कि बाइक गाड़ देने से सभी सबूत मिट जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इसी तरह तीन साल पहले अमन और जितेंद्र ने एक 15 साल के लड़के की हत्या कर दी। फिर बाहरी मंगोलपुरी से दोनों शव को अपने बीच में बाइक पर बिठाकर पांच किलोमीटर दूर विजय विहार में फेंकने गए।

इसी तरह एक तरीका है शव का चेहरा बिगाड़ देना या जला देना आदि। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि उन्हें जब कोई खुन्नस होती है या पुरानी दुश्मनी निकालते हैं तो ये तरीका निकालते हैं।
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