अपने आदेश में न्यायमूर्ति ने कहा कि यह एक स्थापित कानून है कि पीड़िता का बयान विश्वास उत्पन्न करता हो तो केवल उसी के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है। इसके लिए सहायक साक्ष्य की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि, पीड़िता का बयान विरोधाभासों से भरा है और यह विश्वास उत्पन्न नहीं करता।
हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी को बरी किए जाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि पीड़िता के बयान में संदेह होने पर निचली अदालत का निर्णय सही है।
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न्यायमूर्ति अमित महाजन ने मामले में राज्य सरकार की याचिका को खारिज कर दिया। अपने आदेश में न्यायमूर्ति ने कहा कि यह एक स्थापित कानून है कि पीड़िता का बयान विश्वास उत्पन्न करता हो तो केवल उसी के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है। इसके लिए सहायक साक्ष्य की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि, पीड़िता का बयान विरोधाभासों से भरा है और यह विश्वास उत्पन्न नहीं करता।
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि प्राथमिकी (एफआईआर) घटना के 10 दिन बाद दर्ज की गई थी और अभियोजन पक्ष इस देरी के लिए कोई ठोस स्पष्टीकरण देने में विफल रहा। घटना 1 अप्रैल 2015 को हुई थी, लेकिन पीड़िता ने 10 अप्रैल तक पुलिस को सूचित नहीं किया और वह आरोपी की फैक्टरी में काम करती रही, जिससे उसके आचरण पर संदेह पैदा होता है।
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अदालत ने कहा कि आरोपी की पत्नी को पूरी घटना की जानकारी थी फिर भी उसने पीड़िता को फैक्टरी में दोबारा काम पर लौटने के लिए मजबूर किया। पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता पर बड़ा संदेह पैदा करता है। पीड़िता के पति द्वारा दिए गए साक्ष्य भी पीड़िता के बयान से विरोधाभासी हैं।
ससुराल वालों से अलग रह रही महिला के लिए आवास का किराया देने के आदेश
उधर, द्वारका कोर्ट ने घरेलू हिंसा के एक मामले में अलग रह रही महिला के ससुराल वालों को उसके लिए आवास की व्यवस्था या उचित समय तक उसके मकान का किराया देने का आदेश दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शरद गुप्ता महिला अदालत के सितंबर, 2023 के आदेश के खिलाफ पीड़िता की ओर से दायर अपील पर सुनवाई कर रहे थे। महिला अदालत ने अपने पुराने फैसले में महिला के पति को निर्देश दिया था कि या तो वह उसे वैवाहिक घर में रहने दे या आवास के लिए 7 हजार रुपये किराया दे। ऐसे में मजिस्ट्रेट अदालत ने पति के खिलाफ दायर घरेलू हिंसा अधिनियम के मामले में महिला को राहत दी थी। महिला ने दावा किया कि मजिस्ट्रेट अदालत किराया देने के लिए वैकल्पिक आदेश पारित नहीं कर सकती थी। इसके बजाय उसे वैवाहिक घर में रहने का पूर्ण अधिकार था।