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Delhi High Court: लिंग परिवर्तन पर नौसैनिक की बर्खास्तगी पर रक्षा मंत्रालय से मांगा जवाब, 2017 का है मामला

Tue, 28 Oct 2025 07:46 AM IST
अनुज कुमार गौरव बाजपेई, अमर उजाला, दिल्ली

सार

दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर नौसैनिक साबी गिरि की 2017 में नौसेना से बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका पर रक्षा मंत्रालय से जवाब मांगा है। कोर्ट ने सवाल उठाया है। अब अगली सुनवाई 28 नवंबर को निर्धारित की है।
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दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति को नौसेना से बर्खास्त करने के मामले में रक्षा मंत्रालय से जवाब मांगा है। कोर्ट ने मंत्रालय से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी), सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम, 2007 के अलावा अन्य कानूनों की सांविधानिक वैधता पर निर्णय ले सकता है।
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यह मामला वर्ष 2017 में नौसेनाकर्मी की बर्खास्तगी से जुड़ा है। इस नौसैनिक मनीष गिरि ने लिंग परिवर्तन करा महिला के तौर पर पहचान बनानी शुरू की थी। उसने अपना नाम भी साबी गिरि कर लिया। वहीं, केंद्र सरकार ने कोर्ट से कहा कि याचिकाकर्ता को सेवा नियमों के उल्लंघन और अनुशासनहीनता के कारण बर्खास्त किया गया।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय, जस्टिस सी हरिशंकर और जस्टिस ओमप्रकाश शुक्ला की पीठ ने कहा कि मामले का परिणाम सेना, नौसेना और वायुसेना सहित सभी सशस्त्र बलों के कर्मियों पर प्रभाव डाल सकता है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि रक्षा मंत्रालय के सचिव या उनकी ओर से नामित किसी अधिकारी की ओर से मामले में निर्देश दिए जाएं। कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता गौतम नारायण को न्याय मित्र नियुक्त किया और सभी पक्षों से 14 नवंबर तक लिखित दलीलें और संबंधित निर्णयों का संकलन जमा करने को कहा है। अगली सुनवाई 28 नवंबर को होगी।
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दावा, नियम ट्रांसजेंडरों की पहचान को मान्यता नहीं देते : मनीष गिरि 2016 में लिंग परिवर्तन कराकर साबी गिरि बन गए। 2017 में नौसेना ने उन्हें बर्खास्त कर दिया, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिका में कहा, नौसेना ने बिना किसी आधार के पांच महीने मनोरोग वार्ड में रखा। गिरि ने नौसेना नियमों के वे प्रावधान रद्द करने की मांग की, जिनके तहत उन्हें हटाया गया। उनका तर्क है, ये प्रावधान ट्रांसजेंडरों की पहचान को मान्यता नहीं देते।

दावा, नियम ट्रांसजेंडरों की पहचान को मान्यता नहीं देते
मनीष गिरि 2016 में लिंग परिवर्तन कराकर साबी गिरि बन गए। 2017 में नौसेना ने उन्हें बर्खास्त कर दिया, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिका में कहा, नौसेना ने बिना किसी आधार के पांच महीने मनोरोग वार्ड में रखा। गिरि ने नौसेना नियमों के वे प्रावधान रद्द करने की मांग की, जिनके तहत उन्हें हटाया गया। उनका तर्क है, ये प्रावधान ट्रांसजेंडरों की पहचान को मान्यता नहीं देते।

लंबे बाल-नेलपॉलिश सेवा नियमों के खिलाफ : केंद्र
केंद्र ने याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाते हुए कहा, याचिकाकर्ता को अनुशासनहीनता के आधार पर हटाया गया, क्योंकि उसने बाल लंबे कर लिए, नेल पॉलिश लगाई और भौहें तराशीं। ये सभी सेवा नियमों के अनुरूप उठाए गए कदम नहीं थे।

याचिकाकर्ता ने बिना अनुमति लिंग परिवर्तन सर्जरी करवाई और आठ बार बिना छुट्टी के अनुपस्थित रहे। केंद्र सरकार ने कहा कि ऐसे मामलों में पहली सुनवाई सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में होनी चाहिए।
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डिवीजन बेंच ने पूर्ण पीठ को सौंपा था मामला, उठाए थे यह सवाल
क्या सशस्त्र बल न्यायाधिकरण नौसेना अधिनियम जैसे अन्य कानूनों की वैधता पर फैसला करने में सक्षम है?
क्या नीलिमा चहर मामले के निर्णय को न्यायाधिकरण को नौसेना कानून जैसे कानूनों की वैधता पर फैसला देने का अधिकार के रूप में समझा जाए?
यदि ऐसा है, तो क्या यह अधिकार उन सभी न्यायाधिकरणों तक विस्तारित होगा, जो संविधान के अनुच्छेद 323ए और 323बी के तहत गठित नहीं हैं? 
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