याचिका में कहा गया है कि शरणार्थियों के लिए अपने देश की सरकार से पासपोर्ट बनवाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। ऐसे में पासपोर्ट की अनिवार्यता उनके शिक्षा के अधिकार में बाधा बन रही है। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि उनकी पहचान और शैक्षणिक योग्यता भारतीय बोर्डों के दस्तावेजों और यूएनएचसीआर के रिकॉर्ड से पहले ही सत्यापित है। इसके बावजूद केवल पासपोर्ट के अभाव में प्रवेश से वंचित करना संविधान के समानता और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है।
शरणार्थी पहचान पत्र को पासपोर्ट का विकल्प बनाने की मांग
हेनरी ने विश्वविद्यालय से अनुरोध किया कि उनके यूएनएचसीआर शरणार्थी पहचान पत्र को पासपोर्ट के स्थान पर स्वीकार किया जाए, लेकिन डीयू ने इसे मानने से इनकार कर दिया। याचिका में कहा गया है कि जब विश्वविद्यालय अपने नियमों में यूएनएचसीआर के दस्तावेजों को मान्यता देता है, तब पासपोर्ट की अलग से अनिवार्यता विरोधाभासी और मनमानी है।
तिब्बती शरणार्थियों को छूट, म्यांमार के शरणार्थियों को क्यों नहीं?
याचिका में यह भी दलील दी गई है कि डीयू तिब्बती शरणार्थियों को वैकल्पिक दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश की अनुमति देता है, जबकि म्यांमार के शरणार्थियों को यह सुविधा नहीं मिल रही। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह समान परिस्थितियों में अलग-अलग व्यवहार है, जो भेदभावपूर्ण और संविधान के समानता के सिद्धांत के विपरीत है।