उच्च न्यायालय ने माना कि पति-पत्नी का आपसी सहमति से तलाक के समझौते से एकतरफा हटना मानसिक क्रूरता के समान है। कोर्ट ने पति को तलाक देने के पारिवारिक अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और नीना बंसल कृष्णा की खंडपीठ ने उच्च न्यायालयों के फैसलों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि जब पति-पत्नी आपसी रजामंदी से तलाक पर सहमत होते हैं, तो पति या पत्नी द्वारा एकतरफा सहमति वापस ले ली जाती है तो यह जीवनसाथी के प्रति होने वाली क्रूरता को बढ़ाता है।
पीठ ने कहा, इस प्रकार अपीलकर्ता/पत्नी के ऐसे आचरण से पति को यह विश्वास हो गया कि उनके विवाद समाप्त होने वाले हैं और फिर समझौते के प्रयास से पीछे हटना पति के मन में बेचैनी, क्रूरता और अनिश्चितता पैदा कर सकता है।
यह स्पष्ट है कि पार्टियों के बीच की लड़ाई किसी भी उचित आधार पर नहीं थी, बल्कि जीवनसाथी के खिलाफ प्रतिशोध लेने की इच्छा से प्रेरित अहंकार के बीच एक युद्ध था। इस प्रकार आपसी सहमति से तलाक से इस तरह की एकतरफा वापसी क्रूरता के समान है।
पीठ ने 20 मार्च 2017 के पारिवारिक अदालत के आदेश के खिलाफ एक महिला द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह निष्कर्ष निकाला जिसमें क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए उसके पति की याचिका को अनुमति दी गई थी। जोड़े ने दिसंबर 2001 में शादी की थी लेकिन यह शादी केवल तेरह महीने तक ही टिक पाई क्योंकि जनवरी 2003 में वे अलग हो गए।