दिल्ली हाईकोर्ट ने लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में किरायेदारों का किराया माफ करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इंकार कर दिया। यह फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि वह किसी और के पैसे को दान में नहीं दे सकती। इतना ही पीठ ने अदालत का कीमती समय बर्बाद करने के लिए याचिकाकर्ता पर 10 हजार रुपए का हर्जाना भी लगाया है।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटले और न्यायामूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए याचिका पर संज्ञान लिया। याचिका संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा दिल्ली के किरायेदारों के आधार पर जनहित याचिका दायर करना गलत और आधारहीन है। पीठ ने कहा कि कोर्ट कोविड19 के खतरे को देखते हुए किराएदारों को किराना देने से छूट नहीं दे सकती, चूंकि किराया मकान मालिक का हक है और किसी और के हक को दान में नहीं दिया जा सकता।
यह याचिका वकील गौरव जैन की ओर से दायर की गई थी। याचिका में उन्होंने मांग की थी कि कोविड19 के कारण किराएदारों का अप्रैल, मई और जून माह का किराया माफ करने के लिए निर्देश जारी किए जाएं। उन्होंने मांग की कि मकान मालिकों को निर्देश दिए जाएं कि वे किराय वसूलने के लिए किराएदारों के खिलाफ कोई भी जबरन कदम ना उठाएं।
इस पर पीठ ने कहा कि दिल्ली के किराएदारों की अनुपस्थिति में, याचिकाकर्ता के आधार पर ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता, जिससे किराएदारों को किराया देने से छूट मिल सके। पीठ ने कहा कि कानून से परे कोई भी ऐसा आदेश जारी करना दूसरे पक्ष के साथ अन्याय साबित होगा। पीठ ने कहा कि अगर मकान मालिक का किराएदार के साथ रेंट एग्रीमेंट है और उस रेंट एग्रीमेंट में कोविड19 जैसी महामारी के दौरान किराया देने से छूट की कोई शर्त है तो तभी किराया माफ हो सकता है, अन्यथा किराया लेना मकानमालिक का अधिकार है।
इसके साथ ही पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी आधार पर याचिका दायर करके अदालत का समय नष्ट किया है, यह किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। इसलिए अदालत ने याचिकाकर्ता पर 10 हजार रुपए का हर्जाना लगाया और इस राशि को चार सप्ताह के भीतर दिल्ली राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण में जमा कराने का निर्देश दिया। इस राशि का प्रयोग कोविड19 राहत के लिए किया जाएगा।