दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय सचिवालय क्लब में कार्यरत्त माली गीतम सिंह को दिल्ली सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी न देने के निणर्य को गलत ठहरया है।
अदालत ने क्लब को माली को न्यूनतम मजदूरी व बकाया राशि सहित देने का निर्देश दिया है। इतना ही नहीं अदालत ने क्लब को उसे 50 हजार रुपये बतौर हर्जाना भी देने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति सी.हरशिंकर ने अपने फैसले में कहा कि नियोक्ता अपने जहां कार्यरत्त किसी भी कर्मचारी को न्यूनतम मजदूरी देने के लिए बाध्य है। अदालत ने कहा ऐसा न करना अवैध और अनैतिक ही नहीं बल्कि आपराधिक श्रेणी में भी आता है।
अदालत ने माली गीतम की याचिका स्वीकार करते हुए क्लब प्रशासन को उसे बकाया राशि ब्याज सहित अदा करने का निर्देश दिया है। याची गीतम सिंह क्लब में 13 सितंबर 1989 से कार्यरत्त है।
याची ने आरोप लगाया कि उसे न्यूनतम वेतन से काफी कम राशि दी जा रही है। याची ने वर्ष 1995 में औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत याचिका दायर कर 1989 से 1995 की अवधि केदौरान की न्यूनतम मजदूरी की मांग की। उसने दावा किया कि न्यूनतम मजदूरी 27785 रुपये मिलने चाहिए।
श्रम अदालत ने उसे 15240 रुपये देने का आदेश जारी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ दोनो ही पक्ष हाईकोर्ट आ गए। याची गीतम के अधिवक्ता अनुज अग्रवाल तर्क दिया कि नियोक्ता द्वारा न्यूनतम मजदूरी का भुगतान नहीं करना एक अपराध है और यह बंधुआ मजदूरी के बराबर है।
उन्होंने कहा किसी भी परिस्थिति में किसी कर्मचारी को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के नीचे मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा सकता है। अदालत ने उनके तर्क को स्वीकार करते हुए केन्द्रीय सचिवालय क्लब द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए याची को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने का निर्देश जारी कर दिया।