दिल्ली हाईकोर्ट ने जिला अदालतों की मूल जरूरतों की पूर्ति के लिए धन न देन पर दिल्ली सरकार की फटकार लगाई। पीठ ने कहा कि सरकार अदालतों के माध्यम से काफी राजस्व प्राप्त कर रही है, इसके बावजूद अदालतों की मूल जरूरतें पूरी नहीं की जा रही हैं। पीठ ने दिल्ली सरकास से सवाल किया कि क्या सरकार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को मारना चाहती है?
न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने इस मामले पर सरकार के प्रति सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अदालतें जुर्माना, यातायात चालान एवं अदालत फीस के माध्यम से राज्य को काफी राजस्व दे रही हैं। जिला अदालतों ने डिजिटल यातायात जुर्माने के माध्यम से 115 करोड़ रुपये इकट्ठा किए, जो दिल्ली सरकार के कोष में जमा हैं।
इस बीच उच्च न्यायालय को विशेष कार्य अधिकारी (परीक्षा) रीतेश सिंह ने सूचित किया कि 2018-19 में जिला अदालतों ने 80 करोड़ रुपए इकट्ठा किए थे और 90 करोड़ रुपए के अदालत शुल्क बेचे, जिसे दिल्ली सरकार के पास जमा कराया गया।
इसपर पीठ ने कहा कि राजस्व मिलने के बावजूद अदालतों की मूल जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार धन क्यों नहीं दे रही है। पीठ ने दिल्ली से कहा कि अदालतों की जरूरतों को पूरा करने के लिए धन दिया जाए, ताकि अदालतें सुचारू रूप से अपना काम कर सकें।