देश की राजधानी, जो सपनों का शहर है... लेकिन यही शहर जब आग की चपेट में आता है तो कई जिंदगियां भी राख हो जाती हैं। काले धुएं के गुबार से ढकता आसमान, सायरन की चीखती आवाजें, बिलखते-चीखते लोग...ये मंजर नया नहीं रहा। हर साल दिल्ली आग के बड़े बड़े तांडव को झेलती है।
दिल्ली फायर सर्विस के आंकड़े के अनुसार वर्ष 2024 में आग से 113 मौतें हुईं, जो 2025 में घटकर 76 रह गईं। वर्ष 2026 में 3 मई तक 45 लोगों की जान जा चुकी है और 200 से अधिक लोग झुलस चुके हैं। रोहिणी और पालम जैसे हादसे इस खतरे की जमीनी हकीकत दिखाते हैं।
15 अप्रैल का वो खौफनाक दिन जब रोहिणी के बुध विहार इलाके में आग की घटना ने लोगों का दिल झकझोर कर रखा दिया था। यहां झुग्गियों में आग लगी थी और पति-पत्नी के साथ उनकी तीन साल की बच्ची की जिंदा जलकर मौत हो गई। आग इतनी भयावह थी कि परिवार को निकलने का रास्ता तक नहीं मिला और वो जिंदा जल गए।
18 मार्च की सुबह जब दिल्ली के पालम इलाके में लोग नींद से जाग ही रहे थे, तभी चार मंजिला इमारत आग रूपी काल के मुंह में समा रही थी। इस भीषण अग्निकांड में एक ही परिवार के 9 लोगों की जिंदा जलकर मौत हो गई, जबकि परिवार के 3 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इस दर्दनाक घटना में मृतकों की संख्या महज एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि दिल्ली के प्रशासनिक खोखलेपन व सुरक्षा मानकों की अनदेखी की एक डरावनी तस्वीर है।
सामान्य दिनों में रोजाना औसतन 80-90 फायर कॉल मिलती हैं, लेकिन अप्रैल में 140 पहुंच गई थी। आग की घटनाएं एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि झुग्गी क्लस्टर, कूड़े के ढेर, गोदाम व रिहायशी मकानों सभी जगहों से कॉल आ रही हैं।
-एके मालिक, चीफ फायर ऑफिसर, दिल्ली फायर सर्विस