राजधानी में 100 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले की फाइल बीते एक वर्ष से ठंडे बस्ते में है। मामले में अब तक एफआईआर दर्ज कराने की अनुमति नहीं मिल पाई है। ऐसे में जांच आगे नहीं बढ़ पा रही है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए डीटीसी, क्लस्टर बस, टैक्सियों और ऑटो में पैनिक बटन और जीपीएस सिस्टम लगाने के मामले में 100 करोड़ से अधिक का घोटाला बीते वर्ष मई में सामने आया था। भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) ने मामले से पर्दा उठाने को एफआईआर दर्ज करने के लिए सतर्कता निदेशालय के सचिव को पत्र लिख कर अनुमति मांगी थी, लेकिन अभी तक अनुमति नहीं मिल सकी है।
एसीबी के अधिकारियों ने बताया कि बीते वर्ष जून में सतर्कता निदेशालय के सचिव को अनुमति के लिए पत्र लिखा गया था। इस पर सतर्कता विभाग के सचिव ने परिवहन आयुक्त से मामले में अपना पक्ष रखने को कहा था, लेकिन परिवहन आयुक्त ने कोई जवाब नहीं दिया। इस स्थिति में मामला ठंडे बस्ते में चला गया है। नियम के अनुसार, परिवहन आयुक्त को दो माह के अंदर जवाब देना चाहिए। यदि वह मामले में कानूनी सलाह लेना चाहे तो एक माह का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। एसीबी के अधिकारियों के अनुसार, इस मामले में तीन माह के समय भी बीत चुका है।
ऑडिट में पाई गईं थी कई खामियां...
बीते वर्ष गड़बडी का पता चलने पर उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने टैक्सियों, आटो, डीटीसी और क्लस्टर बसों में लगे पैनिक बटन का आडिट करने के निर्देश दिया था। इस दौरान फर्जीवाड़े का पता चला। एसीबी की ऑडिट में पता चला कि करीब 5500 बसों में पैनिक बटन जैसे डिवाइस लगाए गए, जिनमें जांच के दौरान 4600 बसें सडकों पर दौड़ती मिलीं। बसों में डिवाइस लगाने के लिए एक कंपनी को 95 करोड़ का भुगतान किया गया था। इसके अलावा 3000 रुपये प्रति माह प्रति बस के रखरखाव पर अलग से खर्च दिखाया गया था।
महिलाओं को इससे कोई फायदा नहीं हो रहा था। दरअसल पैनिक बटन की कनेक्टविटी 112 (पुलिस के कमांड और कंट्रोल रूम) नंबर से नहीं पाई गई थी, जिस कारण काॅल पुलिस कंट्रोल रूम में नहीं आई। इसके साथ ही बसों में जो सीसीटीवी कैमरे लगाए गए उसे मानीटर करने के लिए बनाए गए केंद्रों में कोई कर्मचारी तैनात नहीं था। पैनिक बटन अलार्म की निगरानी के लिए बनाया गया कंट्रोल रूम भी काम नहीं कर रहा था।