राजधानी में इन दोनों कोरोना के साथ-साथ बढ़ता प्रदूषण लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गया है। राज्य सरकार प्रदूषण के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। नगर निकायों की ओर से भी कई अभियान चलाए जा रहे हैं। प्रदेश सरकार पटाखों पर प्रतिबंध के साथ-साथ इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के अलावा विभिन्न प्रकार के अभियान चला रही है। इसके बावजूद दिल्ली की हवा बहुत खराब श्रेणी में बनी हुई है। दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर अमर उजाला संवाददाता किशन कुमार की खास रिपोर्ट।
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हवा और मौसम से पड़ता है प्रभाव
अमूमन अक्तूबर माह में उत्तर-पश्चिम भारत से मानसून की वापसी हो जाती है। हवा का रुख भी पूर्व दिशा से उत्तर- पश्चिम दिशा की ओर हो जाता है। ऐसे में इस दिशा से आने वाली हवा अफगानिस्तान, पाकिस्तान और कई बार राजस्थान से भी अपने साथ धूल लेकर चलती है। इस वजह से सर्दी के मौसम में राजधानी में प्रदूषण के तत्वों को बढ़ने में सहायता मिलती है।
तापमान भी है महत्वपूर्ण कारक
राजधानी में प्रदूषण के बढ़ने में तापमान भी महत्वपूर्ण कारक है। हवा के रुख के बदलने के साथ ही तापमान में भी गिरावट दर्ज की जाती है। इसका असर वेंटिलेशन इंटेक्स पर पड़ता है।
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यदि वेंटिलेशन इंडेक्स छह हजार वर्ग मीटर प्रति सेकंड और हवा की रफ्तार 10 किलोमीटर प्रति घंटे से कम होती है तो इससे प्रदूषण बढ़ने में मदद मिलती है। यही वजह है कि तापमान में गिरावट दर्ज होने के साथ वेंटिलेशन इंडेक्स भी घट जाता है।
वाहनों का प्रदूषण भी जिम्मेदार
राजधानी में प्रदूषण के लिए न सिर्फ मौसम और हवा जिम्मेदार हैं वरन वाहनों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषण भी इसके लिए बराबर भागीदार माना जाता है।
आईआईटी, कानपुर के प्रोफेसर और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के स्टीयरिंग कमेटी के सदस्य डॉक्टर एसएन त्रिपाठी बताते हैं कि करीब 16 फीसदी प्रदूषण वाहनों से निकलता है। यदि सभी वाहनों को बीएस6 कर दिया जाए तो प्रदूषण कोआधा तक किया जा सकता है। वहीं, इसके अलावा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषण भी इसके लिए बराबर जिम्मेदार है।
औद्योगिक इकाइयों की भी हिस्सेदारी
राजधानी में प्रदूषण को लेकर हाल ही में सरकार ने भी राजधानी में नई औद्योगिक इकाइयों के लगाने पर फैसला देते हुए सिर्फ सेवा क्षेत्र को ही मंजूरी दी है। प्रोफेसर एसएन त्रिपाठी ने बताया कि राजधानी में प्रदूषण फैलाने वाले कई औद्योगिक इकाइयों को पीएनजी में बदला जा रहा है, लेकिन इसके अलावा भी कई औद्योगिक इकाईयां हैं जो गैर कानूनी तरीके से चल रही हैं।
वहीं, केंद्र द्वारा प्रदूषण को लेकर बनाए गए नए आयोग को राजधानी के अलावा पड़ोसी राज्यों में भी औद्योगिक इकाइयों को पीएनजी पर चलाने की व्यवस्था करनी चाहिए जिससे हवा को प्रदूषित होने से रोका जा सके।
पराली भी है प्रदूषण का एक कारण
दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में जलाए जाने वाली पराली भी राजधानी में प्रदूषण का एक कारक मानी जाती है। दरअसल, फसल की कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पराली में सिलिका की मात्रा अधिक पाई जाती है। इस वजह से यह जानवरों को भी खिलाने योग्य नहीं रहता।
यही वजह है कि किसान नई फसलों की बुवाई के लिए किसान पराली जलाते हैं। इस वजह से प्रत्येक वर्ष दिल्ली के पड़ोसी राज्य में पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की जाती हैं। इस सीजन रविवार को पराली की धुएं में सबसे अधिक 40 फीसदी हिस्सेदारी रही थी।
ग्रेप के नियम पर फंसता है पेच
राजधानी में प्रदूषण को नियंत्रण करने के लिए गत 15 अक्तूबर को पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) ने ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) लागू किया था। इसके तहत दिल्ली- एनसीआर में जेनरेटर पर पाबंदी लगाई गई थी।
इस संबंध में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व अपर निदेशक डॉक्टर दीपांकर साहा कहते हैं कि राजधानी में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए लागू किए जाने वाले ग्रेप का नियम राजधानी में सीमित रहता है।
जबकि पड़ोसी राज्यों में जेनरेटर पर प्रतिबंध नहीं लग पाता है। ऐसे में कहीं ना कहीं दिल्ली एनसीआर से डीजल जनरेटर समेत खुले में कूड़ा जलाने और मलबे से होने वाला प्रदूषण भी दिल्ली की आबोहवा पर सीधे तौर पर प्रभाव डालता है।
पिछले कई वर्षों में भी उठ चुके हैं कई कदम
राजधानी में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पिछले कई वर्षों में भी कदम उठाए गए हैं। इसके तहत वर्ष 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने लेड युक्त पेट्रोल को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का आदेश दिया था। वर्ष 1996 में एच श्रेणी के उद्योगों का स्थानांतरण किया गया इसके बाद वर्ष 1998 में बसों के साथ-साथ टैक्सी को भी सीएनजी में बदलने का आदेश जारी किया गया था।
वहीं, वर्ष 2003 आते-आते एक्शन प्लान को भी लाया गया, लेकिन इसके बाद भी प्रदूषण को कम करने में मदद नहीं मिली। 2017 में ग्रेप लागू किया गया। वहीं, 2018 में राजधानी के हॉटस्पॉट क्षेत्रों की पहचान की गई जहां सबसे अधिक प्रदूषण फैलता है।
राजधानी में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषण की हिस्सेदारी करीब 20 से 22 फीसदी मानी जाती है। वहीं, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश से निकलने वाला प्रदूषण राजस्थान होते हुए दिल्ली पहुंचता है। इसके लिए इंडो गंगेटिक प्लेन भी जिम्मेदार है। यही सब कारण है कि सर्दियों में प्रदूषण बढ़ जाता है। -डॉ. दीपांकर साहा, पूर्व अपर निदेशक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
राजधानी में प्रदूषण के लिए यहां की भौगोलिक स्थिति भी जिम्मेदार है। इसके अलावा निर्माण कार्य, औद्योगिक इकाइयां और पराली का धुआं समेत वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण भी इसमें कारक है। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए राजधानी के अलावा पड़ोसी राज्यों में भी सख्त कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। -प्रोफेसर एसएन त्रिपाठी, सदस्य, स्टीयरिंग कमेटी, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय
सर्दी के मौसम में हवा का रुख पूर्व से उत्तर पश्चिम दिशा की ओर हो जाता है। वहीं, हवा की रफ्तार भी कम हो जाती है। इस वजह से धूल और प्रदूषण के तत्व हवा में जम जाते हैं। जिससे सर्दी के मौसम में हवा की सतह में प्रदूषण देखने को मिलता है। -महेश पलावत, प्रमुख वैज्ञानिक, स्काईमेट वेदर