बच्चों के पेशे को लेकर आरोपों पर जस्टिस शर्मा ने कहा- वादी तय नहीं कर सकता कि जज के बच्चे अपना जीवन कैसे जिएं। जज के बच्चे सरकारी पैनल में वकील हैं, सिर्फ इस आधार पर न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। यदि नेताओं के बच्चे राजनीति में आ सकते हैं, तो जजों के बच्चों के वकालत में आने पर सवाल कैसे उचित हो सकता है? जस्टिस शर्मा ने कहा, किसी भी वादी को यह हक नहीं दिया जा सकता कि वह तय करे कि जज के बच्चे कैसे जीवन जिएं, जब तक साबित न हो कि जज के पद का दुरुपयोग हुआ है। बच्चों का इस मामले से कोई संबंध नहीं। केजरीवाल का आरोप था, जस्टिस शर्मा का बेटा व बेटी केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं। उन्हें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता काम देते हैं। इसलिए निष्पक्षता को लेकर उचित आशंका बनती है।
जस्टिस शर्मा ने कहा- सीबीआई ने स्पष्ट किया है कि जस्टिस शर्मा के किसी भी रिश्तेदार का आबकारी नीति मामले से कोई भी संबंध नहीं है। न ही उन्होंने किसी भी स्तर पर इस केस में कोई भूमिका निभाई है। यदि सिर्फ सरकारी पैनल में शामिल होने को ही हितों के टकराव का आधार मान लिया जाए, तो फिर ऐसे मामलों में कोई भी जज सुनवाई नहीं कर पाएगा, जहां केंद्र सरकार पक्षकार हो।
केजरीवाल ने कहा था-अमित शाह के बयानों से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पूर्वाग्रह का डर है। वहीं, जस्टिस शर्मा ने कहा- नेताओं के बयानों पर कोर्ट का नियंत्रण नहीं। केजरीवाल खुद राजनेता हैं। राजनीति में विपक्ष की ओर से ऐसे बयान सामान्य है।
केजरीवाल ने संजय सिंह मामले का उदाहरण देते हुए कहा था-जस्टिस शर्मा के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है। इसलिए उन्हें केस नहीं सुनना चाहिए। जस्टिस शर्मा ने कहा- जज की क्षमता का फैसला उच्च अदालत करती है, पक्षकार नहीं। संजय सिंह को राहत मेरिट पर नहीं, बल्कि ईडी की रियायत पर मिली थी। मेरा आदेश दरकिनार नहीं किया गया था।
केजरीवाल ने कहा था, अदालत ने पहली ही सुनवाई में प्रतिकूल टिप्पणियां दीं, जिससे 6 निष्पक्षता पर संदेह है। इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा, जब इसी कोर्ट ने केजरीवाल व राघव चड्ढा के पक्ष में पहली तारीख पर अंतरिम राहत दी थी, तब निष्पक्षता पर सवाल क्यों नहीं उठे?