देश की राजधानी में वर्ष-2020 के विधानसभा चुनाव में 148 निर्दलीय प्रत्याशियों पर नोटा भारी पड़ा था। इन प्रत्याशियों को कुल 35374 मत मिले थे। यह कुल मत प्रतिशत का 0.38 प्रतिशत था, जबकि नोटा को 43019 मत मिले थे जो कुल मत का 0.46 प्रतिशत था।
दरअसल, वर्ष 2009 में स्थानीय निकाय के चुनावों में पहली बार नोटा का उपयोग किया गया था। यह विकल्प देने वाला छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य बना था। इसके बाद चुनाव आयोग ने वर्ष-2013 में विधानसभा चुनावों में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में नोटा का विकल्प दिया।
चुनाव आयोग ने दिल्ली की जनता को यह अधिकार भी पहली बार वर्ष 2013 के चुनाव में दिया था। यह पहला मौका था जब दिल्ली समेत चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में नोटा का इस्तेमाल किया गया। उस समय दिल्ली के साथ छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनाव हुए थे। इस चुनाव में 49884 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में कुल 35875 नागरिकों ने नोटा का इस्तेमाल किया था।
प्रत्याशी पसंद नहीं आने पर चुना जाता है नोटा
चुनाव के दौरान मतदान करते वक्त अगर मतदाता को लगता है कि कोई भी उम्मीदवार योग्य नहीं है, तो मतदाता नोटा का बटन दबा सकता है। चुनाव आयोग के मुताबिक नोटा का इस्तेमाल जनता को यह अधिकार देता है कि वे किसी भी उम्मीदवार को वोट देने से इनकार कर सकते हैं।
यह विकल्प उन्हें लोकतंत्र में अपनी असंतुष्टि व्यक्त करने का एक तरीका प्रदान करता है। हालांकि, परिणामों पर नोटा का सीधा असर नहीं होता, लेकिन यह संकेत देता है कि चुनावी प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है। चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक नोटा के बढ़ते प्रभाव के बावजूद यह जरूरी है कि राजनीतिक दल इस पर गंभीरता से विचार करें। यदि नोटा का प्रतिशत अधिक बढ़ता है, तो यह उस क्षेत्र की राजनीति में एक नई दिशा को जन्म दे सकता है।
विधानसभा चुनाव में नोटा
वर्ष, निर्दलीय प्रत्याशी, मत मिले, नोटा
- 2013 ---222 49774 49884
- 2015 ---195 47627 35875
- 2020 ---148 35374 43019