सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव व अरविंद केजरीवाल।
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विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया है। इससे इंडिया गठबंधन में हलचल दिख रही है। बावजूद इसके दिलचस्प यह कि दिल्ली में दोनों दलों का खास वजूद नहीं है।
बीते विधानसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि इनको दिल्ली की जनता ने पसंद नहीं किया है। सपा ने जिन 4 विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी उतारे, उसमें सबसे ज्यादा वोट 2008 में मिले। लेकिन हैरानी की बात यह कि सभी 36 उम्मीदवार को मिलाकर पार्टी 30,073 वोट ही हासिल कर सकी थी। वहीं, किसी भी चुनाव में एक भी प्रत्याशी जीत हासिल नहीं कर सका। दूसरी तरफ ममता बनर्जी की अगुवाई वाली ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने सिर्फ 2003 के चुनाव में दो सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे।
इसके बाद या पहले ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस सीधे तौर पर दिल्ली के मुकाबले में शामिल नहीं हुई। दोनों प्रत्याशी मिलकर हजार वोट का आंकड़ा नहीं छू पाए थे। विश्लेषक मानते हैं कि समर्थन राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय दलों के बीच लामंबदी का एक तरीका हो सकता है। इसके सहारे दिल्ली में आप को खास फायदा नहीं होने जा रहा है।
बसपा और जनता दल यूनाइटेट का खुला है खाता
दिल्ली को दूसरे राज्यों में प्रभावी राजनीतिक दल रास नहीं आते हैं। बसपा अब तक अकेले ही चुनाव लड़ी है। 2008 में बसपा के दो विधायक बने थे। 2013 में जनता दल यूनाइटेड का 27 में से 1 प्रत्याशी जीता था। इसी वर्ष शिरोमणि अकाली दल के एक प्रत्याशी को जीत मिली थी। बसपा ने इस बार अकेले चुनाव में उतरने का ऐलान किया हुआ है।
आरजेडी रेस से बाहर
लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल दिल्ली में सियासी जमीन तलाशने को 5 बार चुनाव में प्रत्याशी उतार चुका है। पहली बार आरजेडी ने दिल्ली में 1998 चुनाव में 13 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। वहीं, आखिर चुनाव 2020 में कांग्रेस गठबंधन में शामिल होकर 2020 में लड़ा था। सबसे अच्छा प्रदर्शन 2008 में रहा था जब आरजेडी के 11 प्रत्याशियों ने 39,713 वोट हासिल किए थे।