प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को द्वारका के रामलीला मैदान में एक बड़े जनसमुदाय को संबोधित किया। मंच पर आने से लेकर जाने तक के बीच वे कई बार जाट वोटरों को सहेजते हुए दिखाई पड़े। अपने हावभाव से लेकर बातों के जरिए वे जाट वोटरों के दिल में भाजपा के लिए जगह बनाने की कोशिश करते रहे।
प्रधानमंत्री के रैली स्थल पर पहुंचने के बाद उनका स्वागत जाट नेता परवेश वर्मा ने किया और वही उन्हें मंच के ऊपर भी लेकर आए। जबकि ठीक उसी समय मंच पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और पार्टी के महामंत्री अनिल जैन भी मौजूद थे। लेकिन प्रधानमंत्री के स्वागत की जिम्मेदारी युवा जाट नेता परवेश वर्मा के ऊपर थी।
इतना ही नहीं, मंच पर परवेश वर्मा की कुर्सी भी पीएम की कुर्सी के ठीक बगल में थी। प्रधानमंत्री के बोलने के पहले जब तक अन्य नेता बोल रहे थे, प्रधानमंत्री लगातार परवेश वर्मा से कुछ बातचीत करते नजर आ रहे थे। जानकारों का मानना है कि यह प्रधानमंत्री का जाट वोटरों को सहेजने का तरीका था।
क्या परवेश वर्मा के रूप में भाजपा दूसरा फायर ब्रांड ‘योगी आदित्यनाथ’ गढ़ने की तैयारी कर रही है?
पार्टी के संकेतों को समझने की कोशिश करें तो इसका इशारा साफ मिल जाता है। हाल ही में परवेश वर्मा के विवादित भाषणों को भी इसी रणनीति का एक हिस्सा माना जा सकता है।
परवेश वर्मा का कद उस समय भी बढ़ता दिख गया था जब जनवरी माह में बूथ कार्यकर्ताओं के सम्मेलन ‘पंच परमेश्वर’ में उन्होंने पूरा मंच अकेले संभाल रखा था। ‘बूथ जीता, चुनाव जीता’ के नारे से चुनावी मुहीम का आगाज करते हुए भी अमित शाह ने न सिर्फ परवेश वर्मा की तारीफ की, बल्कि उन्हें पार्टी का बड़ा नेता करार दे दिया था। माना जा रहा था कि उस कार्यक्रम से भी भाजपा ने जाट वोटरों को बड़ा संकेत दिया था।
दुष्यंत चौटाला को भी बताया अपने से बड़ा नेता
जाट वोटरों को सहेजने के लिए पार्टी ने हरियाणा में सरकार में अपनी सहयोगी पार्टी जननायक जनता पार्टी (जजपा) नेता दुष्यंत चौटाला को भी आमंत्रित किया था। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन के दौरान उन्हें वहां मौजूद नेताओं में सबसे बड़ा नेता बताया। साफ़ था कि दिल्ली से सटे इलाकों में जाट वोटरों को संभालने के लिए प्रधानमंत्री ने सोच समझकर इन शब्दों का इस्तेमाल किया। दुष्यंत चौटाला ने भी अपने संबोधन में जाट वोटरों को चौधरी देवी लाल के दिनों की याद दिलाई और बताया कि किस प्रकार जब तक वे राजनीति के केंद्र में थे, किस प्रकार उनकी बात सुनी जाती थी।