यह खुलासा एम्स के एक अध्ययन से हुआ है। एम्स ने इस अध्ययन में पांच स्कूलों में पढ़ने वाले छह से 19 वर्ष के 3888 बच्चों को शामिल किया। इसमें तीन सरकारी और दो निजी स्कूल के बच्चे शामिल हैं।
खान-पान में आए बदलाव के कारण स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का वजन सामान्य से अधिक मिल रहा है। सरकारी स्कूलों के मुकाबले निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में यह समस्या ज्यादा है।
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यह खुलासा एम्स के एक अध्ययन से हुआ है। एम्स ने इस अध्ययन में पांच स्कूलों में पढ़ने वाले छह से 19 वर्ष के 3888 बच्चों को शामिल किया। इसमें तीन सरकारी और दो निजी स्कूल के बच्चे शामिल हैं।
अध्ययन में शामिल हुए कुल बच्चों में 1985 बच्चे सरकारी व 1903 बच्चे निजी स्कूलों के हैं। अध्ययन के दौरान छह से नौ साल तक के बच्चे की शारीरिक जांच की गई। 10-19 वर्ष के बच्चों के ब्लड प्रेशर व ब्लड सैंपल लेकर काेलेस्ट्रोल, शुगर सहित दूसरी जांच हुई।
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जांच में पाया गया कि बच्चों में मोटापा, काेलेस्ट्रोल, हाइपरटेंशन, डिस्लिपिडेमिया सहित दूसरी समस्या बढ़ गई है। आगे चलकर यह दिल सहित दूसरे गंभीर रोग दे सकता है।
शोध के अनुसार करीब 15.66 फीसदी बच्चों में अधिक वजन की समस्या दिखी। इसमें सरकारी स्कूल के बच्चों में यह समस्या 7.63 फीसदी में और निजी स्कूल के बच्चों में यह समस्या 24.02 फीसदी दिखी।
इसके अलावा 13.41 प्रतिशत बच्चे मोटापे से ग्रस्त पाए गए। सरकारी स्कूलों की तुलना में प्राइवेट स्कूल के बच्चे मोटापे से अधिक पीड़ित हैं। वहीं लड़कियों की तुलना में लड़के मोटापे से अधिक पीड़ित हैं।