दिल्ली की राजनीति में वोट प्रतिशत का खेल निर्णायक रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि 40 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करने वाली पार्टियां ही सत्ता तक पहुंच पाई हैं। पिछले तीन दशकों के चुनावी परिणाम इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं।
दिल्ली विधानसभा के 1993 के चुनाव में भाजपा ने 42.8 प्रतिशत वोट के साथ 49 सीटें जीतीं और सरकार बनाई। यह चुनाव भाजपा के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह पहली बार था जब राष्ट्रीय राजधानी में भाजपा ने सरकार बनाने का अवसर पाया।
1998 से 2008 के बीच कांग्रेस का दौर रहा। 1998 में कांग्रेस ने 47.8 प्रतिशत वोट और 52 सीटें जीतकर सत्ता में एंट्री की। इसके बाद 2003 में कांग्रेस ने 48.1 प्रतिशत वोट और 47 सीटें जीतीं। 2008 के चुनाव में कांग्रेस को 40.3 प्रतिशत वोट और 43 सीटों के साथ लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का मौका मिला।
40 प्रतिशत से नीचे रहने पर बिगड़ता है खेल
दिल्ली में 40 प्रतिशत से कम वोट हासिल करने वाली पार्टियां सत्ता में नहीं आ सकीं। 2013 का चुनाव देखें, जहां भाजपा ने सबसे ज्यादा 33.07 प्रतिशत वोट हासिल किए, लेकिन वह सरकार बनाने में असफल रही। आप ने 29.49 प्रतिशत और कांग्रेस ने 24.55 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। दोनों पार्टियां ने मिलकर सरकार बनाई और आप के अरविंद केजरीवाल सीएम बने, लेकिन यह सरकार 49 दिन ही चल पाई थी।
2015 और 2020 में आप की आंधी में उड़ी भाजपा और कांग्रेस
2015 का चुनाव आप के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ। पार्टी ने 54.5 प्रतिशत वोट के साथ 67 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद 2020 में आप ने 53.8 प्रतिशत वोट के साथ 62 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। 1993 से अब तक कुल छह बार ऐसे चुनाव हुए हैं, जिनमें 40 प्रतिशत से अधिक वोट पाने वाली पार्टी ने सरकार बनाई। भाजपा ने 1993 में कांग्रेस ने 1998, 2003 और 2008 में जबकि आप ने 2015 और 2020 में 40 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल किए। यह आगामी चुनावों के लिए राजनीतिक दलों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि जीत के लिए मजबूत और स्पष्ट जनसमर्थन अनिवार्य है।
चुनाव, वोट प्रतिशत, सीटे
- 1993, 42.8, 49, भाजपा
- 1998, 47.8, 52, कांग्रेस
- 2003, 48.1, 47, कांग्रेस
- 2008, 40.3, 43, कांग्रेस
- 2015, 54.5, 67, आप
- 2020, 53.8, 62, आप