एम्स दिल्ली के डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि अस्पतालों में प्रभावशाली लोगों को मिलने वाले विशेष इलाज यानी 'वीआईपी कल्चर' से सामान्य मरीजों की अनदेखी हो रही है और उन्हें समस्या का सामना करना पड़ रहा है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली के डॉक्टरों ने यह चिंता जताते हुए अस्पतालों में समान नीतियां लागू करने और चिकित्सा संबंधी फैसले मरीज की जरूरत के आधार पर लेने की सिफारिश की है।
ऑन्कोलॉजी रिव्यूज जर्नल में छपे एक लेख में एम्स के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. एमडी राय और उनके छात्र डॉ. हेमा सिरी कोट्टू ने अपने कैंसर सर्जरी के अनुभवों के आधार पर बताया कि जब कोई रसूखदार मरीज आता है, तो अस्पताल प्रशासन या उनके परिजनों का दबाव डॉक्टरों पर होता है। इसके चलते कई बार मरीज की सर्जरी से पहले की तैयारी किए बिना ही जल्दबाजी में ऑपरेशन कर दिया जाता है। प्रभावशाली मरीजों के लिए लंबे समय तक आईसीयू बेड रोक कर रखे जाते हैं, जिसकी वजह से उन सामान्य मरीजों को बेड नहीं मिल पाता जिन्हें इसकी ज्यादा सख्त जरूरत होती है।
58 वर्षीय महिला की बिना तैयारी के हुई सर्जरी, फेफड़ों में आई समस्या
लेख में उदाहरण देकर पूरी सि्थति को बेहतर तरीके से बताया गया है। इसमें पहला मामला 58 वर्षीय महिला का है, जो डिम्बग्रंथि कैंसर से जूझ रही थी। अस्पताल प्रबंधन के दबाव में बिना पूरी तैयारी के उसकी सर्जरी की गई और लंबे समय तक आईसीयू में रखा गया। समय पर मूवमेंट न होने से फेफड़ों में दिक्कतें आईं और अस्पताल में रुकने का समय 5 दिन से बढ़कर 12 दिन हो गया।
डॉक्टरों के सुझाव और समाधान
डॉ. राय ने स्पष्ट किया कि मरीज का सवाल पूछना या दूसरी राय लेना उनका अधिकार है, लेकिन जरूरी मेडिकल नियमों और सुरक्षा मानकों की अनदेखी का दबाव बनाना गलत है। इससे निपटने के लिए डॉक्टरों ने कुछ सुझाव भी दिए हैं, जिसके मुताबिक अस्पतालों में भर्ती होने के कड़े नियम होने चाहिए। अस्पताल से छुट्टी करने की नीतियां बिल्कुल साफ और समान होनी चाहिए। स्वास्थ्य संसाधनों का आवंटन सामाजिक स्थिति या रसूख के बजाय केवल मरीज की मेडिकल जरूरत के आधार पर होना चाहिए।