फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेहद खराब हालत से गुजर रहीं दिव्यांग जनों की देखभाल करने वाली संस्थाएं, ये है वजह

Wed, 19 Aug 2020 09:15 PM IST
Mohit Mudgal अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
विज्ञापन

नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड संस्था में लगभग 250 ऐसे दृष्टिबाधित लोगों की देखरेख की जाती है जिन्हें संभालना किसी सामान्य परिवार/व्यक्ति के लिए बेहद मुश्किल होता है। इस संस्था में ऐसे बच्चे भी शामिल हैं जिनकी इन्हीं परेशानियों को देखते हुए उनके अपने ही परिवार ने उनका त्याग कर दिया है। वे पूरी तरह अनाथ हैं और अपने जीवन के लिए इन्हीं संस्थाओं पर निर्भर करते हैं।

विज्ञापन


यह संस्था विभिन्न कंपनियों से मिली सीएसआर फंड और समाज से मिल रही आर्थिक सहायता पर निर्भर करती है। लेकिन कोरोना काल में कंपनियों को हो रहे भारी आर्थिक नुकसान ने संस्था के सहयोग का रास्ता बंद कर दिया है जिससे संस्था के लिए अब दिव्यांग लोगों की सहायता करना संभव नहीं रह गया है। 

दक्षिणी दिल्ली की संस्था ‘मुस्कान’ बौद्धिक दिव्यांग बच्चों की देखभाल करती है। यहां इस समय भी 200 विभिन्न कैटेगरी के दिव्यांग बच्चों की देखरेख की जाती है। लेकिन कोरोना काल में कंपनियों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने से इसको मिलने वाली आर्थिक सहायता भी ठप हो गई है और लोगों की नौकरियां जाने से इसने सैकड़ों सहयोगी हाथ खो दिए हैं। अब इस संस्था के लिए भी इतने बच्चों का खर्च चलाना और स्टाफ को वेतन देना बेहद मुश्किल हो गया है। 

ऐसी ही हजारों संस्थाएं हैं जो देश भर में दिव्यांग लोगों की देखभाल में जुटी हुई हैं, लेकिन इस समय ये सभी बेहद बुरी आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रही हैं। इस आर्थिक तंगी का सीधा असर दिव्यांग लोगों की देखभाल पर पड़ रहा है। फिलहाल इस क्षेत्र की मदद करने के लिए सरकार सहित किसी एजेंसी का ध्यान नहीं गया है। इसका बुरा असर दिव्यांग लोगों की जिन्दगी पर पड़ सकता है। 

नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड संस्था के जनरल सेक्रेटरी प्रशांत रंजन वर्मा ने अमर उजाला को बताया कि दिव्यांगों की समस्याएं जटिल कैटेगरी की होती हैं। यही कारण है कि एक प्रशिक्षक दो से तीन दिव्यांगों की देखभाल नहीं कर सकता। 250 दिव्यांग जनों की देखभाल के लिए उन्हें 50 स्टाफ रखने पड़े हैं। लेकिन कोरोना संकट में अब वे अपने स्टाफ का वेतन तक देने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।

अब वे अपने स्टाफ को आधा वेतन ही दे पा रहे हैं। कंपनियों की खराब होती माली हालत उनकी स्थिति को बद से बदतर बना रही है। कई बड़ी कंपनियों से मिलने वाला सीएसआर फंड भी मिलना बंद हो गया है जिससे उनकी स्थिति चिंताजनक हो गई है। नियमों के मुताबिक़ बड़ी कंपनियों को अपने औसत नेट प्रॉफिट का दो फीसदी पैसा सीएसआर के रूप में खर्च करना अनिवार्य है। 

इन संस्थाओं के सहयोग का एक बड़ा स्रोत केंद्र सरकार द्वारा दी गई आर्थिक सहायता होती है। लेकिन आरोप है कि केंद्र सरकार से पास होने वाली आर्थिक सहायता लालफीताशाही के कारण तीन-चार साल तक क्लियर नहीं हो पाती है। इस समय भी उनकी इसी तरह की आर्थिक सहायता तीन वर्ष से अटकी पड़ी है। ऐसी हालत में अब वे उन अभिभावकों से अपने बच्चों को अपने घर ले जाने के लिए कहने पर मजबूर हो गए’ हैं जो दिल्ली क्षेत्र या आसपास में रहते हैं। लेकिन जिन दिव्यांग जनों के पास कोई भी परिवार जन नहीं हैं, उनकी सहायता का कोई अन्य विकल्प उनके पास नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन

अगले दो-तीन साल कठिन समस्या 

मुस्कान की वरिष्ठ अधिकारी शांति औलक कहती हैं कि कोरोना काल की स्थिति से कंपनियों की स्थिति जितनी खराब हुई है, उसे देखते हुए लगता है कि उनकी आर्थिक स्थिति सुधरने में दो से तीन साल तक का समय लग सकता है। लिहाजा इन कंपनियों से सीएसआर के रूप में आर्थिक सहयोग मिलना मुश्किल हो जाएगा। ऐसी स्थिति में दिव्यांग जनों की सेवाओं के मामले में स्थिति बेहद खारब हो सकती है। इसका सीधा असर दिव्यांग लोगों की जिन्दगी पर पड़ सकता है। 

विशेषज्ञ की राय 
दिल्ली राजधानी क्षेत्र के पूर्व निःशक्त जन आयुक्त टीडी धरियाल ने कहा कि देश में दिव्यांग जनों की देखभाल के लिए केंद्र या राज्य सरकारों के स्तर पर कोई बड़ी संस्था नहीं है। एक-दो जगहों पर कुछ सेंटर चलाए जाते हैं, लेकिन दिव्यांग जनों की भारी संख्या के सामने ये नगण्य है। पूरे देश में यह कार्य स्वयं सेवी संस्थाओं के दम पर ही चलता है। ऐसे में अगर केंद्र या राज्य सरकारें इनका सहयोग नहीं करती हैं तो दिव्यांगों की हालत बेहद खराब हो सकती है। सरकारों को इनके लिए ठोस योजना समय रहते पेश करनी चाहिए।    

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें