फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भारत में पहली बार 'ओरल सेक्स' के लिए मजबूर करने वाले को मिली रेप की सजा

Fri, 05 Aug 2016 02:13 PM IST
वात्सल्य राय/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
विज्ञापन
- फोटो : Demo Pic
विज्ञापन
भारत के कानूनी इतिहास में यह पहला मामला है जब ओरल सेक्स को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है और किसी को सज़ा सुनाई गई है। दिल्ली की एक अदालत ने फ़िल्म 'पीपली लाइव' के सह-निर्देशक और इतिहासकार महमूद फ़ारूक़ी को बलात्कार के केस में सात साल की जेल की सज़ा सुनाई है।
विज्ञापन


फ़ैसला आने के बाद बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय ने वृंदा ग्रोवर से बात की जिन्होंने इस फैसले से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित किया।

ये मेरे हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण फ़ैसला है : इसका महत्व बताने के मैं दो-तीन बातें रेखांकित करती हूं। सबसे पहले तो 2013 में जब क़ानून में संशोधन किया गया, उसमें इस बात पर क़ानूनमें संशोधन हुआ कि महिला का जो शरीर है, महिला का जो अस्तित्व है, उसपर केवल महिला की मर्ज़ी होनी चाहिए।

उस पर किसी भी तरह के हमले को बलात्कार माना जाएगा। हमारे देश के क़ानून में पहले 'पीनो वेजाइनल रेप' को बलात्कार मानते थे।

अब ये जो केस है, इसमें अमरीकन स्कॉलर यहां रिसर्च करने आई थी उन्होंने इल्ज़ाम लगाया था कि उनके साथ फ़ारूक़ी ने फोर्स्ड ओरल सेक्स किया है। और अब क़ानून ने उसको बलात्कार माना है और उसी श्रेणी में रखा है जिसमें पीनो वेजाइनल रेप को रखा गया है।
विज्ञापन

इस तरह के क्राइम की नहीं है कोई परिभाषा

महमूद फ़ारूक़ी
इस केस में महिला की बात को सही और सत्य मानते हुए अदालत ने फ़ारूक़ी पर सात साल की सज़ा और 50 हज़ार ज़ुर्माना लगाया है। साथ में लीगल सर्विस अथॉरिटी को निर्देश दिया है कि वो भी उस महिला को मुआवजा देंगे।

मेरी जानकारी में ये ऐसा पहला मामला है। मेरे हिसाब से ये बात दर्शाती है हमें कि इस तरह का क्राइम हो रहा था समाज में। मगर हमारे पास परिभाषा ही नहीं थी इसकी और हम इसको एक हल्का क्राइम मानते थे।

संशोधन में इसको बलात्कार की श्रेणी में डाला गया। इसलिए उसकी सही सज़ा मिल पाई। महिलाओं की ज़िंदगी और महिलाओं पर किस तरह की हिंसा हुई है उसके आधार पर क़ानून में संशोधन किया गया था।
विज्ञापन

कानून का मकसद क्या है?

फारुकी
सज़ा कितनी होगी ये जज तय करते हैं और इसमें सज़ा जो न्यूनतम है वो अपने आप में बहुत गंभीर है। सात साल की सज़ा एक गंभीर सज़ा होती है।

क़ानून का मक़सद क्या होता है? मक़सद ये होता है कि लोग जानें कि ये गलत है। अपराध है। और अगर आप ऐसा करेंगे तो आप कोई भी हों समाज में, क़ानून आपके ऊपर कठोरता से पेश आएगा।

इस मामले से समाज में संदेश जाता है कि किसी भी प्रकार की हिंसा महिला के ऊपर, महिला के शरीर के ऊपर गंवारा नहीं है। अभियुक्त कोई भी हो, उसको सज़ा दी जाएगी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें