जब-जब लोगों से जुड़े मामलों पर कुठाराघात हुआ तो कोर्ट ने ही इंसाफ किया। हालांकि कोर्ट पहुंचने से पहले लोगों ने स्थानीय प्रशासन, प्राधिकरण और प्रदेश सरकार से गुहार लगाई, मगर कोई फायदा नहीं हुआ।
प्रशासनिक तंत्र के लिए पांच मामले सबक सिखाने के रहे। अधिकारों के हनन में हर बार जीत लोगों की ही हुई और हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जनता के हित में फैसले दिए।
जिला बना, फिर खतम कर दिया
बसपा सरकार ने गौतमबुद्धनगर जिला बनाने की घोषणा की थी। लोगों को काफी खुशी थी कि अब उन्हें सरकारी कामकाज के लिए दूर नहीं जाना होगा। मगर जैसी ही में सपा की सरकार बनी तो जिला भंग कर दिया गया।
गुस्साए लोग सड़क पर उतर गए। फिर भी सरकार टस से मस नहीं हुई। न्याय न मिलता देख लोग हाईकोर्ट पहुंचे और कोर्ट ने 1997 में जिला बहाल कर दिया।
प्राधिकरण ने छीन ली किसानों की जमीन
किसानों की जमीनें मनमाने तरीके से प्राधिकरण ने छीनी। 2009-11 तक प्राधिकरण ने इतनी जमीन अधिगहित कर ली, जितनी पिछले 20 साल में नहीं की गई। जमीन पर इंडस्ट्री न लगाकर बिल्डर को सौंप दी गई।
किसानों ने जब आंदोलन किया तो लाठियां मिलीं और जेलों में ठूंस दिया गया। किसान हाईकोर्ट गए और 21 अक्तूबर 2011 को करीब चार दर्जन गांवों के किसानों के हित में 64 फीसदी अतिरिक्त मुआवजा व 10 फीसदी जमीन देने का आदेश आया।
बिल्डरों ने खरीदारों का किया शोषण
बिल्डरों के प्लैटों का जमाना आया। 2009-10 में लाखों की संख्या में बिल्डरों ने फ्लैट लांच कर दिए। फ्लैट बुक कराए और बिल्डरों ने पैसा भी ले लिया। कब्जा जब समय पर नहीं मिला तो तो खरीदारों ने आंदोलन भी किए।
बिल्डरों की मनमानी से परेशान फ्लैट खरीदार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। सुपरटैक, यूनीटेक समेत कई बिल्डरों को फटकार केसाथ जेल जाने तक की नौबत आ गई। उसका असर यह हुआ कि बिल्डर डर गए। फ्लैट खरीदारों को भी आस जगी है कि फ्लैट न मिला तो कोर्ट से न्याय जरूर मिल जाएगा।
यादव सिंह घोटाला बना मिसाल
नोएडा, ग्रेनो और यमुना प्राधिकरण का पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह का घोटाला सबको पता है। 2014 में ठेकेदारों को ठेके दिए जाने लगे। उसी वक्त आयकर विभाग ने जब छापा मारा तो पूरी दुनिया की आंखे खुली की खुली रह गईं। अकूत संपत्ति जब्त की गई।
मगर प्रदेश सरकार ने फिर भी उसे पाक-साफ माना। आखिरकार जनहित याचिका ने सीबीआई जांच के आदेश दिए और करीब एक साल से यादव सिंह और उनके आधा दर्ज साथी जेल में हैं।
डीएनडी टोल फ्री दिवाली की सौगात
डीएनडी प्रबंधन ने भी खूब मनमानी की और करोड़ों रुपये टोल टैक्स के रूप में लोगों की जेब से निकाल लिए। खूब आंदोलन हुए। जबरन टोल बंद कराया गया, मगर कोई असर नहीं हुआ।
प्राधिकरण, प्रशासन, प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार चुप रही। फिर जनहित याचिका काम आई और 26 अक्तूबर को इलाहाबाद हार्ड कोर्ट ने डीएनडी टोल फ्री करने का आदेश कर दिया।