कोरोना वायरस को मात देने के लिए डॉक्टर दिन-रात जुटे हुए हैं। देश के सबसे बड़े क्वारंटीन सेंटर जो कि आईटीबीपी के छावला स्थित परिसर में तैयार किया गया था, वहां के डॉक्टरों की जिंदगी में अब कई बदलाव आ रहे हैं। ’क्वारंटीन', ये शब्द तो उनकी जिंदगी के साथ जुड़ गया लगता है।
पहले सेंटर पर क्वारंटीन और उसके बाद कमरे पर भी क्वारंटीन जैसा माहौल। कोई मिलने आ जाए तो वहां भी क्वारंटीन के नियमों का पालन करना पड़ता है। डॉक्टरों का कहना है कि चाहे सेंटर हो या कमरा, कोरोना ही दिमाग में घूमता रहता है। कोरोना की इस लड़ाई में इन डॉक्टरों ने अपने परिवार को भी साथ नहीं रखा है।
इनका मकसद है कि सेंटर पर जो भी क्वारंटीन के लिए आए, वह 14 दिन बाद नेगेटिव रिपोर्ट लेकर अपने घर को निकले। आईटीबीपी का यह सेंटर फरवरी में शुरू हुआ था। यहां पर विदेश से आए एक हजार से अधिक लोग क्वारंटीन के लिए पहुंचे हैं। मौजूदा समय में भी यहां पर इटली से आए 481 लोगों को क्वारंटीन में रखा गया है।
सेंटर के नोडल अफसर डॉ. ए.पी. जोशी हैं। उनके साथ डॉक्टरों की एक टीम हैं। इसमें आईटीबीपी के छह-सात डॉक्टर हैं, बीएसएफ की एक महिला डॉक्टर भी शामिल है। ‘टीम के वरिष्ठ डॉक्टर राजकुमार का कहना है कि हम सभी बीएसएफ के ऑफिसर मैस में रहते हैं।
अधिकांश डॉक्टरों का परिवार साथ नहीं है। तीन अप्रैल को इन्हें यहां पर दो माह पूरे हो जाएंगे। सब स्वस्थ और नीरोगी रहकर रात-दिन सेवा कर पा रहे हैं। इसका बड़ा कारण है इन सभी का कड़ाई से सावधानियों का पालन करना।
डॉक्टर राजकुमार कहते हैं, जब हम अपने कमरे से बाहर निकलते हैं तो पूरी तरह सैनिटाइज हो जाते हैं। हमारा ड्राइवर, गाड़ी, कपड़े सभी सैनिटाइज प्रक्रिया से गुजरते हैं। ड्यूटी खत्म होने के बाद जब हम वापस अपने कमरे पर जाते हैं तो मोबाइल, पर्स, पेन, जूते और कपड़े सब बाहर रखने होते हैं।
इनमें मोबाइल और पर्स को दोबारा से सैनिटाइज किया जाता है। कपड़ों को बाहर ही रखा जाता है। उसकी वॉशिंग का एक अलग ही तरीका होता है। हमारे कमरे को रोजाना दो बार सैनिटाइज किया जाता है। हां, अगर कोई मिलने आ जाए तो उसके बाद दोबारा से सैनिटाइज करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
जैसे ही ये डॉक्टर और टीम के बाकी सदस्य सेंटर पर पहुंचते हैं, तो वहां व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों की मदद ली जाती है। क्वारंटीन सेंटर पर दिनभर विदेश से आए लोगों के बीच रहना है। उनके सेंपल लेने पड़ते हैं। लोगों का बुखार, रक्तचाप एवं दूसरी कई तरह की जांच करनी होती हैं।
इस दौरान उनके बातचीत होती है। जैसे ही इन्हें थोड़ी फुर्सत मिलती हैं, तो दुनिया में कोरोना वायरस को लेकर हो रही रिसर्च रिपोर्ट देखते हैं। इस बीच किसी न किसी व्यक्ति के बेड से कॉल आ जाती है कि वहां कोई दिक्कत है। कई बार तो ऐसा होता है कि परिवार से फोन पर बात करने का समय भी नहीं मिलता।
डॉक्टर राजकुमार कहते हैं, हमें अपनी चिंता नहीं होती, मगर परिजनों को हमारी फिक्र रहती है। वे कॉल करते हैं और हम सेंटर में होते हैं, ऐसे में बात नहीं हो पाती। हमारे सामने एक ही मकसद होता है कि जो लोग क्वारंटीन के लिए आए हैं, उनकी रिपोर्ट निगेटिव आए।
सभी डॉक्टर रोजाना सेंटर से बाहर दूसरे भवन में एक बैठक करते हैं। पर्याप्त दूरी बनाकर और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण साथ रखकर बातचीत होती है। एक सवाल के जवाब में डॉ. राजकुमार ने कहा, डॉक्टरों को कोरोना के संक्रमण का खतरा बना रहता है।
हम पूरी सतर्कता बरतते हैं, लेकिन लंबे समय तक हमें संदिग्ध और पॉजिटिव रिपोर्ट वाले लोगों के बीच रहना है, इसलिए गलती या लापरवाही की गुंजाइश बनी रहती है।