घर पर सिर्फ मां और बहन हैं। हम दोनों भाई यहां दिल्ली में रहकर मजदूरी कर जो कमाते थे, उसे घर भेजते थे और उसी से गुजारा चलता था। मां बीमार है। अकेले बहन उनकी देखभाल नहीं कर पा रही है। जमा पूंजी भी समाप्त होने लगी है। फोन पर कल भी मां से बात हुई थी तो वो रो रहीं थी। साथ ही उम्मीद लगाए बैठी थीं कि 14 अप्रैल को लॉकडाउन खुलने पर हम दोनों भाई उनके पास पहुंच जाएंगे, मगर आज पता चला कि लॉकडाउन बढ़ गया है तो घर फोन करने की हिम्मत नहीं हो रही है। - चंद्रभान, लक्ष्मणपुर, टीकमगढ़, मध्यप्रदेश
लॉकडाउन का पता चला तो हम लोग गांव सिकरावा, पुन्हाना से पैदल ही पुंछ, जम्मू जाने के लिए निकल पड़े थे। 30 मार्च को फरीदाबाद से गुजरते हुए पुलिस ने रोक लिया और यहां ले आई। आज 14 दिन हो गए हमें यहां पर, मगर घर जाने के बारे में कोई अता पता नहीं है। घर में पत्नी व बच्चे हैं। यहां से जो थोड़ा बहुत कमाता था वो घर भेजता था, जिससे गुजारा होता था। परिवार में कोई और कमाने वाला नहीं है। वहां घर में क्या हाल होगा, सोच कर भी जी घबराने लगता है। खुदा से यही दुआ कर रहे हैं कि जल्द से जल्द हम घर पहुंच जाएं। लॉकडाउन बढ़ गया है। ऐसे में यहां की सरकार को हमें अपने घर पहुंचे की व्यवस्था करनी चाहिए। - बाग सेन, पुंछ, जम्मू निवासी
सोहना में फ्लाइओवर निर्माण में काम में जुटे थे। लॉकडाउन होने का पता चला तो वहां काम कर रहे छह-सात मजदूर इक्ट्ठा सहारनपुर, उत्तर प्रदेश के लिए चल दिए। सैनिक कॉलोनी मोड़ के पास पुलिस ने रोक लिए और यहां ले आई। घर में हालात बहुत खराब हैं। घर में कमाने वाला कोई और नहीं है। फोन पर बच्चों से बात होती है तो सब परेशान हैं। लॉकडाउन बढ़ने से परेशानी और ज्यादा बढ़ेगी। हम लोग यहां ठहरे हुए हैं। खाने पीने की कोई परेशानी नहीं है, मगर घर वालों का गुजारा कैसे हो रहा होगा, यह सोच कर परेशान हो रहे हैं। - शकील, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश