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जिंदगी की दुश्वारियां भुला जलाए उम्मीद के दीये...वक्त की मार ने तोड़ दिए कई लोगों के सपने

Fri, 24 Apr 2020 08:57 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, नोएडा
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अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफर विक्की रॉय द्वारा सड़कों पर रहने वाले बच्चों का जीवन दर्शाती तस्वीरें - फोटो : अमर उजाला
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जिंदगी बेशकीमती है। इसकी ये अहमियत तब समझ आती है, जब कोरोना संकट जैसी  चुनौती हमारे सामने खड़ी हो। आज जब महामारी से बचने के लिए हर ओर घरों में रहने की नसीहतें दी जा रही हैं, तब भी दिल्ली-एनसीआर सहित देशभर में हजारों ऐसे बच्चे मिल जाएंगे, जिनके पास न घर होगा और न ही घर का सपना देखने की राह उनके लिए आसान होगी।
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जीवन जीने के लिए जद्दोजहद तो हर कोई करता है, लेकिन ऐसी आपदाओं के दौरान बेघरों के लिए संघर्ष और कठिन हो जाता है। मौसम की मार हो या खानेपीने की तंगी, गंदगी, बीमारियां आदि इनके हिस्से आम लोगों से हमेशा अधिक आती हैं। फिर भी, शहर की तंग गलियों में पड़े झोपड़ों, फुटपाथ, रेलवे स्टेशनों पर बेबस बचपन को मुस्कराते देख सकते हैं।

जहां कुछ लोगों के सपने वक्त की मार के साथ टूटते चले जाते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं, जो अपने हौसले से हालातों की दीवारें तोड़कर आगे निकल जाते हैं। वर्तमान संकट और बेघरों की दुश्वारियों पर सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के अंतर्गत प्रगति मिश्रा की एक रिपोर्ट...
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कैमरे में कैद करते हैं अपना बीता हुआ कल

अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफर विक्की रॉय द्वारा सड़कों पर रहने वाले बच्चों का जीवन दर्शाती तस्वीरें - फोटो : अमर उजाला
विक्की रॉय आज एक अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफर के रूप में स्थापित हैं। लेकिन इनका बचपन कूड़ा बीनते और ढाबों में काम करते बीता है। शायद यही वजह है कि इनकी तस्वीरों में स्लम क्षेत्र का संघर्ष आसानी से देखा जा सकता है। दर्जी का काम करने वाले पिता की सात संतानों में से एक विक्की को आर्थिक परेशानियों के चलते पिता ने तीन साल की उम्र में नाना के घर छोड़ दिया था। लेकिन वहां मन न लगने और फिल्मों के प्रभाव में आकर 11 साल के विक्की घर से भागकर दिल्ली आ गए। 

जहां उनका सामना जिंदगी की कड़वी हकीकत से हुआ। विक्की ने कूड़ा-कचरा बीनकर और ढाबों पर काम करके गुजर-बसर की। इसी दौरान किसी ने उन्हें सलाम बालक एनजीओ पहुंचाया। यहां पढ़ाई के साथ उन्होंने फोटोग्राफी सीखना शुरू किया। पढ़ाई में कमजोर होने के कारण वह शिक्षा की दिशा में तो ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके, लेकिन फोटोग्राफी ने उनके लिए नई राहें खोली। 

फिर 2007 में स्ट्रीट ड्रीम नाम से उनकी पहली प्रदर्शनी बेहद प्रसिद्ध हुई। इसके बाद उन्होंने कई राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। उनका नाम 2016 में फोर्ब्स की अंडर 30 लिस्ट में भी आया। वहीं, नेशनल ज्योग्राफी चैनल के एक रियल्टी शो का भी वह हिस्सा रह चुके हैं। 

वर्तमान में विक्की सेव द चिल्ड्रेन के साथ मिलकर 20 अप्रैल से सड़कों पर जीवन जीने वाले बच्चों के जीवन पर आधारित एक डिजिटल प्रदर्शनी आयोजित कर रहे हैं।
 
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तन्वी जब कुछ ही दिनों की थी, एक अनाथालय संचालिका को बेहद कमजोर हालत में बेसहारा मिली थी। डॉक्टरों के अनुसार, उनके जिंदा बचने की संभावनाएं बेहद कम थीं। अनाथालय में परवरिश और इंटर तक शिक्षा पाने के बाद उन्होंने अपने लिए खुद नई मंजिलें तलाशना शुरू किया। 

दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से स्नातक कर नौकरी तलाशने लगीं। केएफसी और सबवे जैसी खाने से जुड़ी कंपनियों के लिए काम किया। उन्होंने बताया कि वह फिलहाल एक निजी कंपनी में शिफ्ट मैनजर हैं। 

उन्हें एक बेहतरीन शेफ बनना है। वह होटल मैनेजमेंट कोर्स करने के पैसे अपनी नौकरी के माध्यम से जुटा रही हैं। कोरोना संकट के इस दौर में उनका काम भले प्रभावित हो, लेकिन सपने और मनोबल में कोई कमी नहीं आई है।

पल्लवी जब एक दिन की थीं, उन्हें कोई बेसहारा बालगृह छोड़कर चला गया। उनका बचपन नोएडा के एक बाल आश्रय गृह साईं कृपा में बीता। आज वो एक कंपनी में सीनियर अकाउंटेंट के तौर पर काम करने के साथ ही कंपनी सेक्रेटरी का कोर्स कर रही हैं। 

संगीत और डांस में भी बेहद रुचि है। अपने पैरों पर खड़े होने के बाद अब वह न सिर्फ अपने सपने पूरा करना चाहती हैं, बल्कि अपने आश्रय गृह के बच्चों को नए सपने देखने के लिए भी प्रेरित करती हैं। वह कोरोना संकट के इस दौर में भी अपने जैसे बेघर बच्चों को जीने का नया हौसला देती हैं।
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