निजामुद्दीन मरकज को खाली कराने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और दिल्ली पुलिस का नाम सामने आया। लेकिन इस अभियान में बहुत से ऐसे अनाम हीरो भी रहे हैं, जिन्होंने मरकज को खाली कराने से लेकर जमातियों को विभिन्न क्वारंटीन सेंटर में छोड़कर आने तक की बहुत ही चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। इन्होंने अपमान सहे, जानबूझकर खत्म होती सोशल डिस्टेंसिंग तो झेली ही, तमाम कही न जा सकने वाली दिक्कतों से भी लगातार दो-चार होते रहे। इतना कुछ होने पर भी सीआरपीएफ के ये जवान अपने काम में लगे रहे। आइए जानते हैं कैसा चुनौती भरा था वह दौर..
रोजाना तीन अलग-अलग प्लाटून (एक प्लाटून में 32 जवान) दस दिन तक मरकज में तैनात रहे हैं। ड्यूटी से लौटते तो वॉशिंग पाउडर में कपड़े और जूते धोने पड़ते थे। सैनिटाइजर का इस्तेमाल केवल बस साफ करने के लिए होता था। यह काम भी जवान खुद करते थे। जब तक मरकज में ड्यूटी रहती थी, ये भूखे रहते थे।
कैंप में आने के बाद किसी को खाना मिलता तो कोई भूखा ही अपने कपड़े और जूते धोने में जुट जाता था। मरकज को खाली कराने के बाद भी सीआरपीएफ की 200वीं बटालियन की तीन प्लाटून 9 अप्रैल तक वहां तैनात रही है। रोटेशन ड्यूटी पर आने वाले एक इंस्पेक्टर ने बताया कि जब मरकज को खाली कराने की कार्रवाई हुई तो सीआरपीएफ के जवानों ने मोर्चा संभाल रखा था।
दिल्ली पुलिस भी उनके साथ रही। जब एनएसए अजित डोभाल 28-29 मार्च की रात को वहां पहुंचे और मकरज को खाली कराया गया तो सीआरपीएफ ने मरकज से करीब तीन हजार लोगों को बाहर निकाला था। मरकज से निकलने वाले किसी भी व्यक्ति ने सहयोग नहीं दिया। सोशल डिस्टेंसिंग के लिए कहा गया तो उसे जानबूझकर तोड़ा। जवानों ने जो सीटिंग प्लान तैयार किया, उसे बिगाड़ दिया गया। कोई सुनने को तैयार नहीं था।
कैंप पर जाते ही सैनिटाइजर से बस को खुद करते थे साफ...
एक सहायक कमांडेंट के अनुसार क्वारंटीन सेंटर से जब ये जवान वापस जाते तो कैंप पर पहुंचते ही इनका पहला काम बस को साफ करना होता था। सोडियम हाइपोक्लोराइड से बस का हर हिस्सा साफ किया जाता था। दस्ताने, जूते और कपड़े सामान्य वॉशिंग पाउडर में धोने पड़ते थे।
कई बार रात को बरसात की वजह से कपड़े और जूते नहीं सूखते तो गीले कपड़े पहनकर ड्यूटी पर जाना पड़ता था। जब मरकज में ड्यूटी रहती तो समझो खाना पीना बंद। वहां पैक खाना भी नहीं मिलता था। कैंप से जो खाकर आते थे, उसी में काम चलता रहा। रात को कैंप में पहुंचने के बाद जैसा खाना मिलता, उसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
कैंप के मैस का तो अपना समय होता है, जबकि जवानों की ड्यूटी कब खत्म होगी, यह पता नहीं है। इतना कुछ होने पर जवानों को ड्यूटी पर जाने से पहले डेली ब्रीफिंग अटैंड करनी पड़ती थी। इन सबके बीच जवानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती खुद को कोरोना से बचाने की थी। इन्होंने अनेक बाधाओं के बावजूद खुद को किसी तरह सुरक्षित रखा और धैर्य के साथ अपने काम को अंजाम दिया।