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अब संविधान पीठ करेगी दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच 'अधिकारों की जंग' का फैसला

Thu, 16 Feb 2017 12:14 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
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दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच अधिकारों को लेकर चल रही 'लड़ाई' का निपटारा अब संविधान पीठ करेगी। बुधवार को दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले को संविधान पीठ केपास भेज दिया।
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न्यायमूर्ति एके सिकरी और न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल की पीठ ने बुधवार को कहा कि इस मामले में महत्वपूर्ण संवैधानिधक व कानूनी मसला जुड़ा है। इसलिए इस मसले का परीक्षण संविधान पीठ करेगी।

हालांकि पीठ ने संविधान पीठ के लिए प्रश्नावली तैयार नहीं की है। पीठ ने कहा कि  हमारी समझ में बेहतर यह होगा कि दोनों ही पक्ष संविधान पीठ के समक्ष नए सिरे से अपनी दलीलें पेश करें।
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दिल्ली सरकार की ओर से पेश वकीलों ने पीठ से कहा कि इस निर्णय से सुनवाई में और देरी होगी। इस पर पीठ ने कहा कि आप चीफ जस्टिस केपास जल्द संविधान पीठ का गठन कर मामले को तेजी से निपटाने का आग्रह कर सकते हैं।
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गत वर्ष चार अगस्त को हाईकोर्ट द्वारा दिए फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : SELF
मालूम हो कि दिल्ली सरकार ने गत वर्ष चार अगस्त को हाईकोर्ट द्वारा दिए उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है जिसमें उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक प्रमुख बताया गया था और साथ ही यह भी कहा गया था कि उपराज्यपाल के लिए मंत्रिमंडल की सलाह या सिफारिशों को मानना बाध्य नहीं है।

दिल्ली सरकार की ओर से पैरवी करने वाले वरिष्ठï वकील गोपाल सुब्रह्मïणयम ने  उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक प्रमुख बताने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले गलत होने के लिए 47 आधार बताए थे।

सरकार की ओर से कहा गया था कि लोकतांत्रिक तरीकेसे चुनी गई सरकार को कुछ भी करने का अधिकार नहीं है। दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए फैसले को मानना उपराज्यपाल के बाध्यकारी नहीं हैं, जो संविधान केमूल ढांचे के खिलाफ है। साथ ही यह विधायी सोच के विपरीत है।
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द‌िल्ली सरकार की टीस पंचायत को भी उससे ज्यादा अध‌िकार

केजरीवाल और मनीष सिसोदिया - फोटो : अमर उजाला
दिल्ली सरकार ने कहा था कि हाईकोर्ट का यह कहना कि मंत्रिमंडल के निर्णय को उपराज्यपाल से मंजूरी जरूरी है, गलत है।

लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार अगर जनता के हितों के लिए काम नहीं कर सकती तो विधानसभा या मंत्रिमंडल का क्या मतलब है।

अगर सब काम उपराज्यपाल ही करेंगे तो सरकार का औचित्य क्या है। दिल्ली सरकार का यह भी कहना कि है कि पंचायत को भी उससे अधिक अधिकार है।
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