ऑटो एक्सपो का रास्ता किधर से है? इन दिनों यह सवाल ग्रेटर नोएडा में कोई भी पूछ सकता है। चाहे वह मेट्रो में बैठकर नोएडा सिटी सेंटर पहुंचा नौजवान हो या परी चौक पर आगरा से मारुति वैन में भरकर आया परिवार।
बुलंदशहर से स्कॉर्पियो में आए नेताजी हों या मेरठ से रोडवेज की बस में बैठकर ग्रेटर नोएडा पहुंची छात्रों की टोली सबकी मंजिल एक ही है। दो साल पहले इस मेले में साढ़े छह लाख लोग जुटे थे। आयोजन कर्ताओं के अनुसार, इस बार यह आंकड़ा दस लाख को पार कर सकता है। आखिर इस चुंबकीय आकर्षण की वजह क्या है।
मेले में आने वाले ज्यादातर लोगों के चेहरों को देखें तो आंखों में हसरतों की चमक दिखेगी। लाखों-करोड़ों की गाड़ी खरीदने का दम भले न हो पर चमकती दमकती लुभाती गाड़ी को पास से देखने और छूने की चाहत तो पूरी हो जाती है। ...और एक विश्वास...कभी तो इसके लायक पैसे होंगे।
यहां आकर नई नई गाड़ियों के बारे में पता चल जाता है
ऑटो एक्सपो के हाल नंबर 9 में टोयोटा कैमारो को बड़ी शिद्दत से निहार रहे विनय मेरठ के पास सरधना के रहने वाले हैं। ये गाड़ी खरीदोगे क्या? सवाल से थोड़ा चौंकते हैं, फिर कहते हैं अरे नहीं मैं तो स्टूडेंट हूं। बीबीए कर रहा हूं।
मेले में क्यों आए? बस दोस्तों से बात करने में टशन रहता है कि मेला देख लिया। तीन-चार गाड़ियों के नाम उनके सामने लूंगा तो अपना नंबर ऊंचा हो जाएगा। हाल नंबर छह में पोलेरिस के क्वैड बाइक के इर्द गिर्द धूम रहे जैकेट पहने शरद शर्मा फिरोजाबाद से आए हैं।
क्या करते हैं, बोले, मेरी किराने की दुकान है। यहां आकर नई नई गाड़ियों के बारे में पता चल जाता है। कभी खरीदने लायक हुए तो ये जानकारी काम आएगी।
नहीं बस एक सेल्फी ले लेनी है, फेसबुक पर डालूंगी
हाल नंबर दस में कॉलेज छात्रा निधि बीएमडब्लू के एंक्लोजर में काफी देर से लाइन में लगी हैं। क्या आप गाड़ियों की शौकीन हैं? वे थोड़ा झेंप जाती हैं, नहीं बस एक सेल्फी ले लेनी है, फेसबुक पर डालूंगी तो ज्यादा लाइक मिलेंगे।
सिर्फ शहरी वर्ग ही नहीं ऑटो एक्सपो में एनसीआर के ग्रामीण इलाकों के नौजवान भी बड़ी संख्या में आते हैं। मकसद ज्यादातर तो तफरीह ही होता है। ऐसे ही एक नौजवान करनबीर 12वीं तक पढ़ाई के बाद मोदीनगर के पास अपने गांव में खेती करते हैं, उनका कहना है हम तो बाइक देखने आते हैं।
अच्छा मॉडल दिख जाए तो पता कर लेते हैं कीमत कितनी है, बाद में उसे ले लेते हैं। यहां मनोरंजन भी हो जाता है। वहीं आयोजक कहते हैं कि वैसे तो हम चाहते हैं गंभीर किस्म के खरीदार मेले में आएं, लेकिन जो भी लोग आते हैं उनसे ऑटो कंपनियों का प्रचार तो हो ही जाता है। यही तो है मनोविज्ञान है, यहां आने वाले लोग आखिर अपने साथ एक सपना भी तो ले जाते हैं।